नरैया तालाब में 40 वर्षों से आस्था की परंपरा कायम, हजारों व्रतियों ने डूबते सूर्य को दिया अर्घ्य

रायपुर के टिकरापारा स्थित नरैया तालाब में छठ महापर्व धूमधाम से मनाया गया। 40 वर्षों से जारी इस परंपरा में हजारों व्रतियों ने डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया। नगर निगम और पुलिस प्रशासन ने मिलकर सुरक्षा और साफ-सफाई की बेहतर व्यवस्था की।

Oct 28, 2025 - 12:15
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नरैया तालाब में 40 वर्षों से आस्था की परंपरा कायम, हजारों व्रतियों ने डूबते सूर्य को दिया अर्घ्य

UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर। हिंदू आस्था और सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ राजधानी रायपुर में मनाया जा रहा है। टिकरापारा स्थित नरैया तालाब छठ घाट में रविवार शाम हजारों श्रद्धालुओं ने पारंपरिक विधि-विधान के साथ डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया।

 

सजे हुए घाट, रंग-बिरंगे स्वागत द्वार और जगमगाती रोशनी के बीच श्रद्धालुओं की भीड़ ने माहौल को भक्तिमय बना दिया। इस अवसर पर महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में पूजा सामग्री के साथ घाट तक पहुंचीं और सूर्यदेव से अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।

 

नरैया तालाब छठ महापर्व आयोजन समिति के प्रमुख वीरेंद्र दुबे ने बताया कि यह पवित्र परंपरा पिछले 40 वर्षों से निरंतर चली आ रही है। जब रायपुर में केवल आमा तालाब और व्यास तालाब में छठ पूजा होती थी, उसी समय से नरैया तालाब में भी श्रद्धालु सूर्य उपासना करते आ रहे हैं। कई परिवारों की अब तीसरी पीढ़ी यहां व्रत कर रही है, जो इस आयोजन की निरंतरता और आस्था का प्रतीक है।

 

वीरेंद्र दुबे ने बताया कि नगर निगम और स्थानीय प्रशासन का निरंतर सहयोग इस आयोजन को सफल बनाता है। नगर निगम की ओर से घाटों की सफाई, लाइटिंग और टेंट की व्यवस्था की गई, जबकि पुलिस विभाग ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए। समिति के सदस्यों ने प्रशासन, निगम और पुलिस को सहयोग के लिए धन्यवाद दिया।

घाट परिसर में भंडारा, प्रवेश द्वार, और व्रतियों के विश्राम स्थल की भी विशेष व्यवस्था की गई थी। शाम के समय "छठ मइया के गीतों" और “कांच ही बांस के बहंगिया” जैसे पारंपरिक गीतों से पूरा माहौल गूंज उठा।

कार्यक्रम के समापन की तैयारी भी की जा रही है। सोमवार, 28 अक्टूबर की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के साथ चार दिवसीय छठ महापर्व का समापन होगा।

नरैया तालाब का यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि रायपुर की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है — जो हर वर्ष हजारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।