अपनी ही फसल के पैसे के लिए भटकता किसान, बलरामपुर में सिस्टम पर उठे सवाल
बलरामपुर में एक किसान अपनी ही फसल का भुगतान पाने के लिए महीनों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। विभागों के बीच तालमेल की कमी से किसान परेशान है और सिस्टम पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
UNITED NEWS OF ASIA. अली खान, बलरामपुर। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई को उजागर करती है। यहां विजयनगर का एक किसान अपनी ही मेहनत की फसल का भुगतान पाने के लिए महीनों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है।
किसान का आरोप है कि उसने शासन के भरोसे अपनी जमीन का धान बेचा, लेकिन आज तक उसे उसका पैसा नहीं मिल पाया है। भुगतान के लिए वह लगातार विभागों के चक्कर लगा रहा है, लेकिन हर बार उसे अलग-अलग कार्यालयों की ओर भेज दिया जाता है।
किसान के अनुसार, जब वह खाद्य विभाग पहुंचता है, तो उसे बैंक जाने को कहा जाता है। बैंक में जाने पर अधिकारी हाथ खड़े कर देते हैं। वहीं जब वह कलेक्टर कार्यालय पहुंचता है, तो उसे कृषि विभाग में आवेदन देने की सलाह दी जाती है। इस तरह वह एक विभाग से दूसरे विभाग तक भटकता जा रहा है, लेकिन समाधान कहीं नहीं मिल रहा।
डिजिटल इंडिया और पारदर्शी व्यवस्था के दावों के बीच यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है। आखिर क्यों एक किसान को अपनी ही फसल का पैसा पाने के लिए इस तरह भटकना पड़ रहा है? क्या विभागों के बीच समन्वय की कमी है या फिर जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति?
किसान की परेशानी केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानवीय भी है। उसके परिवार में बीमार लोग हैं, जिनके इलाज के लिए पैसे की जरूरत है, लेकिन भुगतान न मिलने के कारण वह असहाय महसूस कर रहा है। उसकी स्थिति यह दर्शाती है कि सिस्टम की संवेदनहीनता किस तरह आम लोगों को प्रभावित कर रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई एक मामला नहीं है, बल्कि कई किसानों को इसी तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो इससे किसानों का विश्वास शासन-प्रशासन से उठ सकता है।
सरकार जहां एक ओर किसानों के हित में योजनाएं और समर्थन मूल्य की बात करती है, वहीं दूसरी ओर ऐसी घटनाएं उन दावों को कमजोर करती नजर आती हैं। अधिकारियों का रवैया भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि समस्या के समाधान के बजाय किसान को इधर-उधर भटकाया जा रहा है।
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस मामले में संज्ञान लेकर किसान को उसका हक दिलाएगा, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग समन्वय बनाकर जल्द से जल्द किसान को उसका भुगतान दिलाएं, ताकि उसकी आर्थिक और पारिवारिक समस्याओं का समाधान हो सके।
यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वास्तव में जमीनी स्तर पर योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है या नहीं।