दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तीन प्रतिशत से अधिक का उछाल आया और यह करीब 104.50 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। इसके पीछे अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव को प्रमुख कारण माना जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान की प्रतिक्रिया को “अस्वीकार्य” बताए जाने के बाद बाजार में यह संकेत गया कि दोनों देशों के बीच तनाव जल्द खत्म होने वाला नहीं है।
ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तेहरान ने प्रतिबंध हटाने, मुआवजा देने और होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपने नियंत्रण को मान्यता देने जैसी मांगें रखी हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। ऐसे में वहां किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर पड़ता है।
भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करते हैं, उनके लिए तेल कीमतों में तेजी चिंता बढ़ाने वाली है। तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ता है, जिससे डॉलर की मांग भी बढ़ जाती है। इसका सीधा दबाव भारतीय रुपये पर पड़ता है।
बाजार जानकारों का कहना है कि हाल के दिनों में रुपया कच्चे तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव को काफी करीब से फॉलो कर रहा है। जैसे-जैसे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, वैसे-वैसे भारतीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को अधिक डॉलर खरीदने पड़ते हैं। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
तेल कीमतों में तेजी का असर बॉन्ड मार्केट पर भी दिखाई दिया। भारत की 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड बढ़कर 7 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो पिछले कारोबारी सत्र में 6.98 प्रतिशत थी। इसका मतलब है कि निवेशकों के बीच आर्थिक अनिश्चितता को लेकर चिंता बढ़ रही है।
हालांकि कुछ बैंकिंग विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ सत्रों में रुपये में थोड़ी मजबूती भी देखने को मिली थी। इसकी वजह ऑफशोर बाजारों में डॉलर की लंबी पोजिशन का कम होना था। लेकिन मौजूदा हालात में बाजार पूरी तरह वैश्विक घटनाक्रम पर निर्भर नजर आ रहा है।
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स के ट्रेजरी प्रमुख अनिल भंसाली के मुताबिक, सरकार और रिजर्व बैंक संभवतः रुपये को 100 प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर तक पहुंचने से रोकने की कोशिश करेंगे, क्योंकि यह आर्थिक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रहती है, तो आने वाले दिनों में रुपये पर दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे में निवेशकों और कारोबारियों की नजर अब वैश्विक बाजारों और अमेरिका-ईरान संबंधों पर टिकी हुई है।