मंदिर में प्राचीन समय से ही नवरात्रि के अवसर पर विशेष पूजन-पाठ, आरती, श्रृंगार और कन्या भोज का आयोजन किया जाता रहा है। इसी कड़ी में नवमी के दिन शतचंडी महायज्ञ का आयोजन किया गया, जिसमें नगर के दस जोड़ों की उपस्थिति में विद्वान पंडितों द्वारा विधि-विधान से यज्ञ संपन्न कराया गया।
इस महायज्ञ का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से समाज में सुख-समृद्धि, शांति और पर्यावरण शुद्धि की कामना की जाती है। पंडित कमलेश नागर के अनुसार, यज्ञ से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और क्षेत्र में अच्छी वर्षा तथा समृद्धि का वातावरण बनता है।
इस आयोजन की एक विशेषता यह भी रही कि पिछले दस वर्षों से यहां गुड़ी पड़वा के अवसर पर भागवत कथा का आयोजन भी नियमित रूप से किया जा रहा है। सप्तदिवसीय इस कथा के समापन पर कन्या भोज और महायज्ञ का आयोजन किया जाता है, जो नगरवासियों के लिए विशेष आस्था का केंद्र बन चुका है।
कार्यक्रम के दौरान प्रतिदिन आरती और श्रृंगार के साथ-साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करते रहे। नवमी के दिन महायज्ञ के पश्चात सार्वजनिक आरती का आयोजन किया गया, जिसमें पूरे नगर के लोग शामिल हुए। इसके बाद प्रसादी वितरण किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
समिति के सदस्य गजानंद माली ने बताया कि इस पूरे आयोजन में नगर के सभी वर्गों का भरपूर सहयोग मिला। महाप्रसादी की व्यवस्था भी सामूहिक रूप से की गई, जिसमें सर्व समाज ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। उन्होंने यह भी बताया कि मंदिर के निर्माण और विस्तार का कार्य भी लगातार प्रगति पर है, जिसमें स्थानीय लोगों का सहयोग सराहनीय है।
यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक एकता और समरसता का भी प्रतीक बन गया है। पूरे नगर के लोग एकजुट होकर इस कार्यक्रम को सफल बनाते हैं, जिससे समाज में भाईचारे और सहयोग की भावना मजबूत होती है।
नानपुर में आयोजित यह शतचंडी महायज्ञ श्रद्धा, भक्ति और परंपरा का जीवंत उदाहरण है। यह आयोजन आने वाले वर्षों में भी इसी तरह भव्य रूप में आयोजित होता रहेगा और लोगों को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता रहेगा।