कुसमुंडा खदान में 282 करोड़ के कथित घोटाले का आरोप, CBI और PMO से जांच की मांग

कोरबा की कुसमुंडा खदान में 282 करोड़ रुपये के कथित वित्तीय घोटाले का आरोप लगाया गया है। आरटीआई कार्यकर्ता ने SECL प्रबंधन और निजी कंपनियों पर कोयले की ग्रेडिंग में हेराफेरी कर फर्जी रिफंड देने का आरोप लगाते हुए CBI, PMO और अन्य केंद्रीय एजेंसियों से जांच की मांग की है।

May 13, 2026 - 12:16
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कुसमुंडा खदान में 282 करोड़ के कथित घोटाले का आरोप, CBI और PMO से जांच की मांग

UNITED NEWS OF ASIA. राहुल गुप्ता, कोरबा l कोरबा जिले की कुसमुंडा कोयला खदान एक बार फिर गंभीर आरोपों के कारण सुर्खियों में है। इस बार मामला 282 करोड़ रुपये के कथित वित्तीय घोटाले से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसमें कोयला ग्रेडिंग में हेराफेरी और फर्जी रिफंड जारी करने के आरोप लगाए गए हैं। मामले को लेकर एक आरटीआई कार्यकर्ता और खोजी पत्रकार जितेंद्र कुमार साहू ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) सहित केंद्रीय जांच एजेंसियों से शिकायत कर उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) की कुसमुंडा खदान में तत्कालीन प्रबंधन और कुछ निजी कॉर्पोरेट समूहों के बीच मिलीभगत के जरिए यह कथित घोटाला किया गया। आरोप के अनुसार, कोयले की गुणवत्ता को जानबूझकर कम दिखाकर उसे ‘G15-G17’ जैसी निम्न श्रेणी का घोषित किया गया, जबकि वास्तविक गुणवत्ता अधिक थी। इस प्रक्रिया से निजी कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाने का दावा किया गया है।

आरोपों में यह भी कहा गया है कि अडाणी पावर, वेदांता और आरकेएम जैसे बड़े औद्योगिक समूहों को कथित तौर पर करीब 282 करोड़ रुपये का रिफंड या क्रेडिट नोट जारी किया गया, जिसे शिकायतकर्ता ने “सुनियोजित राजस्व डकैती” करार दिया है। उनका दावा है कि यह पूरी प्रक्रिया बिना स्वतंत्र ऑडिट और पारदर्शी जांच के संपन्न की गई।

शिकायत में बिलासपुर मुख्यालय के कुछ तत्कालीन अधिकारियों पर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि उन्होंने नियमों की अनदेखी करते हुए बड़े पैमाने पर वित्तीय स्वीकृतियां दीं। साथ ही यह भी कहा गया है कि सैंपलिंग और ग्रेडिंग प्रक्रिया में तकनीकी स्तर पर छेड़छाड़ की गई, जिससे कोयले की गुणवत्ता को गलत तरीके से कम दिखाया गया।

इस पूरे मामले को लेकर शिकायतकर्ता ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI), प्रवर्तन निदेशालय (ED), नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) और केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) से डिजिटल फॉरेंसिक ऑडिट की मांग की है। उनका कहना है कि यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच की जाए तो बड़ी वित्तीय अनियमितताएं उजागर हो सकती हैं।

इसके अलावा यह भी मांग की गई है कि CIMFR और QCI जैसी प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट्स और री-सैंपलिंग प्रक्रिया का भी डिजिटल ऑडिट कराया जाए, ताकि पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सके। शिकायत में यह भी उल्लेख है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषी अधिकारियों की चल-अचल संपत्ति जब्त कर वसूली की जाए।

यह मामला सामने आने के बाद कोयला क्षेत्र में पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कोयला ग्रेडिंग और सैंपलिंग जैसी तकनीकी प्रक्रियाओं में यदि किसी प्रकार की गड़बड़ी होती है, तो इसका सीधा असर सरकारी राजस्व पर पड़ता है।

फिलहाल इस पूरे मामले में SECL या संबंधित कंपनियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों को लेकर अब निगाहें केंद्रीय जांच एजेंसियों की संभावित कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।