निजी स्कूलों की फीस वृद्धि पर सियासत तेज: ‘नो स्कूल-नो फीस’ लागू करने की मांग

दुर्ग में निजी स्कूलों की मनमानी फीस वृद्धि के खिलाफ कांग्रेस ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। अभिभावकों पर बढ़ते आर्थिक बोझ को देखते हुए ‘नो स्कूल-नो फीस’ नियम लागू करने और फीस बढ़ोतरी पर नियंत्रण की मांग की गई है।

Apr 29, 2026 - 17:55
 0  5
निजी स्कूलों की फीस वृद्धि पर सियासत तेज: ‘नो स्कूल-नो फीस’ लागू करने की मांग

UNITED NEWS OF ASIA. रोहितास सिंह भुवाल, दुर्ग (छत्तीसगढ़)। निजी स्कूलों द्वारा लगातार फीस वृद्धि के मुद्दे ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। इस बार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव अय्यूब खान के नेतृत्व में पालक प्रतिनिधिमंडल ने इस मुद्दे को लेकर कलेक्टर दुर्ग के माध्यम से राज्य सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाई है। प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव को संबोधित ज्ञापन सौंपते हुए निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाने की मांग की है।

ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि जिले के कई निजी स्कूल हर साल बिना किसी ठोस कारण के फीस में बढ़ोतरी कर रहे हैं। बताया गया कि कई स्कूल मासिक फीस में 700 से 1000 रुपये तक की वृद्धि कर देते हैं, जिससे सालाना 10 से 12 हजार रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ अभिभावकों पर पड़ता है। बढ़ती महंगाई के बीच यह बोझ मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए काफी परेशानी का कारण बन रहा है।

अय्यूब खान ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह की मनमानी अब असहनीय हो चुकी है। उनका आरोप है कि कई निजी स्कूल शिक्षा को सेवा के बजाय व्यवसाय के रूप में चला रहे हैं और अपनी लोकप्रियता व प्रतिष्ठा का लाभ उठाकर अभिभावकों से अधिक शुल्क वसूल रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस पर सख्त नियंत्रण के लिए सरकार को स्पष्ट नियम लागू करने चाहिए।

प्रतिनिधिमंडल ने ज्ञापन के माध्यम से यह भी मांग की है कि किसी भी निजी स्कूल को फीस बढ़ाने से पहले संबंधित शासकीय प्राधिकरण से अनुमति लेना अनिवार्य किया जाए। साथ ही फीस वृद्धि के पीछे का कारण भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे और अभिभावकों को अनावश्यक आर्थिक बोझ से राहत मिल सके।

इसके अलावा, ज्ञापन में ‘नो स्कूल-नो फीस’ नियम को तत्काल लागू करने की भी मांग उठाई गई है। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान जब स्कूल बंद रहते हैं और ट्रांसपोर्ट सेवाएं भी संचालित नहीं होतीं, तब अप्रैल, मई और जून माह की ट्यूशन और बस फीस वसूलना उचित नहीं है। इस अवधि में अभिभावकों को फीस भुगतान से राहत मिलनी चाहिए।

इस दौरान संदीप बख्शी, जसवंत गायकवाड, राकेश दुबे, अभिषेक जांगड़े सहित बड़ी संख्या में पालक प्रतिनिधि उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि यदि सरकार ने इस मुद्दे पर जल्द ठोस कदम नहीं उठाए, तो आगे और व्यापक आंदोलन किया जाएगा।

यह मामला अब केवल फीस वृद्धि तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही का भी सवाल बन गया है। अब देखना होगा कि राज्य सरकार और शिक्षा विभाग इस पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या अभिभावकों को राहत मिल पाती है या नहीं