घरेलू महिलाएं केवल होममेकर नहीं, राष्ट्र निर्माता हैं: सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों के योगदान को मान्यता देते हुए कहा है कि उन्हें केवल होममेकर नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माता कहा जाना चाहिए। अदालत ने घरेलू कार्यों के आर्थिक मूल्य को स्वीकार करते हुए मोटर दुर्घटना मामलों में मुआवजा निर्धारण के लिए उनकी सेवाओं का महत्व रेखांकित किया।

Jun 11, 2026 - 13:30
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घरेलू महिलाएं केवल होममेकर नहीं, राष्ट्र निर्माता हैं: सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी

UNITED NEWS OF ASIA. देश की सर्वोच्च अदालत ने गृहिणियों की भूमिका और योगदान को लेकर एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील टिप्पणी करते हुए कहा है कि घरेलू महिलाओं को केवल "होममेकर" कहकर सीमित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें "राष्ट्र निर्माता" के रूप में सम्मान दिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण में गृहिणियों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसे लंबे समय से पर्याप्त मान्यता नहीं मिल पाई है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने एक सड़क दुर्घटना से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। मामला एक महिला की दुर्घटना में मृत्यु के बाद उसके परिवार को मिलने वाले मुआवजे से संबंधित था। अदालत ने पति को अतिरिक्त मुआवजा प्रदान करते हुए कहा कि एक गृहिणी का योगदान केवल घर के दैनिक कार्यों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह पूरे परिवार की संरचना और भविष्य को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गृहिणियां परिवार की नींव को मजबूत करती हैं। वे बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा, संस्कार और परिवार के समग्र विकास में अहम भूमिका निभाती हैं। उनके द्वारा किया जाने वाला कार्य समाज की अगली पीढ़ी को तैयार करने में योगदान देता है, इसलिए उनके योगदान को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं आंका जा सकता।

अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि गृहिणियों के कार्यों का आर्थिक मूल्य निर्धारित करना आसान नहीं है। हालांकि, न्यायालय ने मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए घरेलू देखभाल और पारिवारिक सेवाओं के नुकसान के लिए 30 हजार रुपये प्रतिमाह का मानक मूल्य स्वीकार किया है। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी सड़क दुर्घटना में गृहिणी की मृत्यु हो जाती है या वह गंभीर रूप से घायल हो जाती है, तो उसके परिवार को केवल इस आधार पर कम मुआवजा नहीं दिया जा सकता कि वह नियमित वेतनभोगी कर्मचारी नहीं थी।

न्यायालय ने माना कि घर का प्रबंधन, भोजन तैयार करना, बच्चों की देखभाल करना, बुजुर्गों की सेवा करना और परिवार के सदस्यों के जीवन को व्यवस्थित बनाए रखना ऐसे कार्य हैं, जिनका सामाजिक और आर्थिक महत्व अत्यधिक है। यदि इन सेवाओं को बाजार आधारित सेवाओं से बदलने का प्रयास किया जाए, तो उनकी लागत काफी अधिक होगी।

इस निर्णय को महिलाओं के सम्मान और उनके अदृश्य श्रम की मान्यता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। लंबे समय से सामाजिक और आर्थिक चर्चाओं में यह मांग उठती रही है कि गृहिणियों के कार्यों को भी औपचारिक मान्यता दी जाए। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उसी दिशा में एक सकारात्मक पहल के रूप में देखी जा रही है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में मोटर वाहन अधिनियम के तहत दायर मुआवजा मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल साबित होगा। इससे उन परिवारों को न्याय मिलने में मदद मिलेगी, जिन्होंने किसी दुर्घटना में गृहिणी को खोया है या जिनकी घरेलू संरचना ऐसी घटनाओं से प्रभावित हुई है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि समाज के लिए एक संदेश भी है कि घर संभालने वाली महिलाएं केवल परिवार का प्रबंधन नहीं करतीं, बल्कि वे राष्ट्र के भविष्य को आकार देने का कार्य भी करती हैं। इसलिए उन्हें "होममेकर" नहीं, बल्कि "राष्ट्र निर्माता" के रूप में सम्मानित किया जाना चाहिए।