भोरमदेव मंदिर में पांच दिवसीय 'महाचतुर शुद्धि सहस्र कलशम्' अनुष्ठान शुरू, गुरु पूर्णिमा तक होंगे विशेष वैदिक आयोजन

कबीरधाम के ऐतिहासिक भोरमदेव महादेव मंदिर में 25 से 29 जुलाई तक 'महाचतुर शुद्धि सहस्र कलशम् 2026' का आयोजन किया जा रहा है। पांच दिवसीय इस महाअनुष्ठान में वैदिक परंपरा के अनुसार रुद्राभिषेक, होमम, सहस्र कलशाभिषेक और अन्य धार्मिक अनुष्ठान होंगे। आयोजन का उद्देश्य मंदिर की आध्यात्मिक परंपरा को पुनर्जीवित करना और श्रद्धालुओं को सनातन संस्कृति से जोड़ना है।

Jul 26, 2026 - 15:30
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भोरमदेव मंदिर में पांच दिवसीय 'महाचतुर शुद्धि सहस्र कलशम्' अनुष्ठान शुरू, गुरु पूर्णिमा तक होंगे विशेष वैदिक आयोजन

UNITED NEWS OF ASIA. सौरभ नामदेव, कवर्धा l छत्तीसगढ़ के 'खजुराहो' के नाम से प्रसिद्ध ऐतिहासिक भोरमदेव महादेव मंदिर में लंबे अंतराल के बाद पांच दिवसीय दिव्य धार्मिक आयोजन 'महाचतुर शुद्धि सहस्र कलशम् 2026' का शुभारंभ हो गया है। यह विशेष अनुष्ठान 25 जुलाई से 29 जुलाई (गुरु पूर्णिमा) तक श्री महा दिव्य देशम् फाउंडेशन (SMDDF) और भोरमदेव सनातन तीर्थ ट्रस्ट, कबीरधाम के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है। इस महाअनुष्ठान में देश के विभिन्न हिस्सों से आए श्रद्धालु और वैदिक विद्वान भाग ले रहे हैं।

मैकाल पर्वत श्रृंखला की तलहटी में स्थित भोरमदेव मंदिर का निर्माण वर्ष 1089 ईस्वी में नागवंशी शासक गोपालदेव के शासनकाल में हुआ था। यह मंदिर अपनी उत्कृष्ट स्थापत्य कला, शैव आगम परंपरा, तांत्रिक साधना और गोंड-बैगा समुदाय की प्रकृति उपासना के अद्भुत समन्वय के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर की पूर्वमुखी संरचना ऐसी है कि सूर्य की पहली किरण सीधे शिवलिंग पर पड़ती है, जो इसकी वास्तुकला की विशेषता मानी जाती है।

आयोजकों के अनुसार, इस महाअनुष्ठान का उद्देश्य केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि मंदिर परिसर की आध्यात्मिक ऊर्जा का पुनर्संवर्धन करना और मड़वा महल तथा छेरकी महल सहित पूरे धार्मिक परिपथ को पुनः सक्रिय करना भी है। अनुष्ठान का संचालन केरल से आए वैदिक आचार्यों द्वारा पारंपरिक आगम पद्धति के अनुसार किया जा रहा है। इसके साथ ही ओडिशा के भुवनेश्वर से आए कलाकारों द्वारा शास्त्रीय नृत्य के माध्यम से भगवान शिव की आराधना तथा केरल के पारंपरिक वाद्ययंत्रों की प्रस्तुति भी दी जा रही है।

फाउंडेशन के संस्थापक आरआर जी ने अपने संदेश में कहा कि मंदिर केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र होते हैं। उन्होंने बताया कि शास्त्रों और आगम परंपरा के अनुसार इस प्रकार के अनुष्ठान मंदिर की दिव्य ऊर्जा के पुनर्जागरण का माध्यम माने जाते हैं, जिससे संपूर्ण क्षेत्र में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक वातावरण का विस्तार होता है।

अनुष्ठान के पहले दिन गणपति होमम, मृत्युंजय होमम, रुद्राभिषेक और भगवद् सेवा का आयोजन किया गया। गणपति होमम के माध्यम से विघ्नों की शांति, मृत्युंजय होमम द्वारा स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की कामना तथा रुद्राभिषेक के माध्यम से भगवान शिव का विशेष अभिषेक वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संपन्न हुआ।

इसके बाद 26 जुलाई को एकादश रुद्राभिषेक, कूष्माण्डी एवं तिल होमम तथा उमामहेश्वर होमम आयोजित किए जा रहे हैं। 27 जुलाई को अघोर रुद्र होमम, परिसर शुद्धिकरण, अस्त्रकलश पूजा, वास्तु होमम और वास्तु बलि होगी। 28 जुलाई को चतुःशुद्धि, कलशाभिषेक, शिवलिंग स्थापन, अष्टदिक्पालक आवाहन, योगिनी त्वरिता पूजा और भगवान शिव के लिए विशेष संगीत एवं नृत्य अर्चना आयोजित की जाएगी। अंतिम दिन 29 जुलाई को सहस्र कलशाभिषेक, उषा पूजा, शिवलिंग निमंजन और श्री चक्र पूजा के साथ इस महाअनुष्ठान का भव्य समापन होगा।

श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पूजा का समय प्रतिदिन सुबह 6 बजे से 11 बजे तथा शाम 5 बजे से 7 बजे तक निर्धारित किया गया है। संकल्प में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं के लिए अनुष्ठान से तीन से पांच दिन पूर्व मांसाहार का त्याग अनिवार्य रखा गया है। मंदिर परिसर में प्रवेश केवल पारंपरिक भारतीय परिधान में ही दिया जा रहा है। पूर्व-पंजीकरण कराने वाले श्रद्धालुओं के लिए 'पहले आओ, पहले पाओ' के आधार पर आवास की व्यवस्था भी की गई है।

भोरमदेव मंदिर में आयोजित यह पांच दिवसीय महाअनुष्ठान न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बना हुआ है, बल्कि सनातन परंपरा, वैदिक संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी महत्वपूर्ण माध्यम माना जा रहा है। आयोजन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है, जिसके लिए मंदिर प्रशासन और आयोजन समिति ने व्यापक व्यवस्थाएं की हैं।