बलरामपुर में स्कूलों में शिक्षकों की कमी का आरोप, गैर-शैक्षणिक कार्यों में तैनाती पर उठे सवाल
बलरामपुर जिले में सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी और शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कई स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित हो रही है, जबकि कुछ शिक्षकों की तैनाती कार्यालयों में की गई है। इस मुद्दे पर जिला शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली भी चर्चा में है।
UNITED NEWS OF ASIA. अली खान, बलरामपुर l छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी और उन्हें गैर-शैक्षणिक कार्यों में तैनात किए जाने को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाया गया है कि जिले के कई स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, जिससे विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। वहीं कुछ शिक्षकों को विद्यालयों के बजाय कार्यालयों में कार्य करने के लिए भेजे जाने को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है।
जानकारी के अनुसार, विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) राजपुर के 17 अक्टूबर 2024 के एक आदेश का हवाला देते हुए आरोप लगाया गया है कि प्राथमिक शाला मुरका की प्रधान पाठक सुरेखा सोनी को पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद मंत्री कार्यालय में कार्य के लिए भेज दिया गया। दावा किया गया है कि 16 अक्टूबर 2024 को उन्हें पदोन्नति देकर प्रधान पाठक बनाया गया और अगले ही दिन विद्यालय से कार्यमुक्त कर दिया गया। इस मामले को लेकर शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि आदिम जाति विकास विभाग के नियमों के अनुसार शिक्षकों को सामान्य परिस्थितियों में गैर-शैक्षणिक कार्यों में नहीं लगाया जाना चाहिए। उनका आरोप है कि ऐसे निर्णयों के कारण कई स्कूलों में शिक्षण व्यवस्था प्रभावित हो रही है और एकल-शिक्षकीय विद्यालयों में पढ़ाई बाधित होने की स्थिति बन रही है।
आरोपों के मुताबिक जिले के अनेक स्कूलों में गणित, विज्ञान और अंग्रेजी जैसे महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षकों की कमी बनी हुई है। इससे विद्यार्थियों की पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ शिक्षक लंबे समय से एबीईओ, बीआरसी और मंडल संयोजक जैसे प्रशासनिक पदों पर कार्यरत हैं, जबकि स्कूलों में शिक्षकों की आवश्यकता बनी हुई है।
शिक्षकों के बीच लागू VSK App के माध्यम से उपस्थिति दर्ज करने की व्यवस्था को लेकर भी असंतोष व्यक्त किया गया है। आरोप है कि कई क्षेत्रों में नेटवर्क की समस्या होने के बावजूद शिक्षकों पर समय पर ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करने का दबाव बनाया जा रहा है। कुछ शिक्षकों का कहना है कि इस व्यवस्था के कारण उन्हें अतिरिक्त खर्च कर नए स्मार्टफोन खरीदने पड़े हैं।
स्थानीय शिक्षक संगठनों का दावा है कि यदि शिक्षकों की कमी दूर नहीं की गई और गैर-शैक्षणिक कार्यों में उनकी तैनाती जारी रही, तो आने वाले समय में कई स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या प्रभावित हो सकती है। उनका कहना है कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सबसे पहले स्कूलों में पर्याप्त शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
जिला शिक्षा अधिकारी मनीराम यादव की कार्यशैली को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप लगाने वालों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब शिक्षकों की गैर-शैक्षणिक कार्यों में तैनाती का मामला सामने आया है। उनका आरोप है कि विभाग में प्रशासनिक कार्यों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर करने की दिशा में अपेक्षित प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि नई शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षकों की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है। यदि स्कूलों में शिक्षक ही नहीं होंगे, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य हासिल करना कठिन होगा।
हालांकि, इस संबंध में शिक्षा विभाग की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यदि विभाग की ओर से कोई स्पष्टीकरण या आधिकारिक बयान जारी किया जाता है, तो उससे स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल यह मामला स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है और लोगों की निगाहें शासन एवं शिक्षा विभाग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं।