चक्रधर कथ्थक कल्याण केन्द्र ने पद्म विभूषण तीजन बाई को दी भावभीनी श्रद्धांजलि

राजनांदगांव के चक्रधर कथ्थक कल्याण केन्द्र में पद्म विभूषण तीजन बाई को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। वक्ताओं ने उनके योगदान को याद करते हुए कहा कि पंडवानी कला को जीवित रखना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

Jul 14, 2026 - 11:01
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चक्रधर कथ्थक कल्याण केन्द्र ने पद्म विभूषण तीजन बाई को दी भावभीनी श्रद्धांजलि

UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर l राजनांदगांव स्थित चक्रधर कथ्थक कल्याण केन्द्र के सभागार में पद्म विभूषण तीजन बाई को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। आयोजित श्रद्धांजलि सभा में कलाकारों, साहित्यकारों, संगीत साधकों और विद्यार्थियों ने लोककला की महान हस्ती को याद करते हुए उनके योगदान को नमन किया। इस अवसर पर सभी ने दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए चक्रधर कथ्थक कल्याण केन्द्र के संस्थापक एवं संचालक डॉ. कृष्ण कुमार सिन्हा ने कहा कि तीजन बाई का निधन लोककला जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने उनके साथ बिताए गए विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों और मंचीय अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि उन्होंने पंडवानी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई। उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा।

अशोक चौधरी ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि कला के साथ शिक्षा भी अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि कई प्रतिभाशाली कलाकार केवल शिक्षा के अभाव में बेहतर अवसरों से वंचित रह जाते हैं। इसलिए कला साधना के साथ ज्ञानार्जन पर भी समान रूप से ध्यान देना चाहिए।

संगीत विशारद अमलेन्दु हाजरा ने कहा कि सच्चा कलाकार अपनी साधना और समर्पण के बल पर हर चुनौती का सामना करता है। उन्होंने कहा कि पंडवानी की परंपरा को आगे बढ़ाना ही तीजन बाई के प्रति वास्तविक श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने यह भी कहा कि कला समाज में नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने का माध्यम है।

राकेश इंदुभूषण ठाकुर ने कहा कि तीजन बाई अपनी प्रभावशाली प्रस्तुति, अभिनय शैली और भाव-भंगिमाओं के माध्यम से महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देती थीं। उन्होंने अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर भारतीय लोकसंस्कृति का गौरव बढ़ाया। उन्होंने कहा कि संगीत और कला की कोई भाषा नहीं होती और यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी।

डॉ. मृदुला चौरसिया और डॉ. आनंद वर्गीस ने भी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि तीजन बाई पंडवानी की पहचान बन चुकी थीं। उनके जाने के बाद इस लोककला परंपरा को संरक्षित और आगे बढ़ाना सभी कलाकारों की जिम्मेदारी है। उन्होंने युवा कलाकारों से पंडवानी जैसी लोक विधाओं को सीखने और संरक्षित करने का आह्वान किया।

श्रद्धांजलि सभा में शैलेन्द्र तिवारी, बी.पी. वासनिक, राजनारायण जांगड़े तथा चक्रधर कथ्थक कल्याण केन्द्र के छात्र-छात्राओं ने भी तीजन बाई को श्रद्धासुमन अर्पित किए। कार्यक्रम में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि तीजन बाई की कला, साधना और सांस्कृतिक विरासत सदैव प्रेरणा देती रहेगी। पंडवानी की परंपरा को जीवित रखते हुए नई पीढ़ी तक पहुंचाना ही उनके प्रति सबसे सच्ची श्रद्धांजलि होगी।