कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि Instagram, Facebook और WhatsApp जैसे प्लेटफॉर्म्स का बच्चों और किशोरों की मानसिक स्थिति पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। विशेष रूप से इंस्टाग्राम को लेकर कोर्ट ने चिंता जताई कि यह प्लेटफॉर्म युवाओं में आत्म-छवि (self-image), चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं को बढ़ावा दे सकता है।
फैसले में यह भी कहा गया कि कंपनी को पहले से ही इन खतरों की जानकारी थी, लेकिन इसके बावजूद पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि टेक कंपनियों की जिम्मेदारी सिर्फ मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि यूजर्स—खासकर बच्चों—की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग बच्चों में नींद की कमी, आत्मविश्वास में गिरावट, साइबर बुलिंग और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं बढ़ा सकता है। इसी संदर्भ में कोर्ट ने Meta को कड़े निर्देश देते हुए कहा कि वह अपने प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट मॉडरेशन, आयु सत्यापन (age verification) और स्क्रीन टाइम कंट्रोल जैसे फीचर्स को और मजबूत करे।
इस फैसले के बाद टेक इंडस्ट्री में हलचल मच गई है। कई विशेषज्ञ इसे एक मिसाल के तौर पर देख रहे हैं, जिससे अन्य सोशल मीडिया कंपनियों पर भी दबाव बढ़ेगा कि वे अपने प्लेटफॉर्म को सुरक्षित बनाने के लिए ठोस कदम उठाएं।
वहीं, Meta की ओर से अभी तक इस फैसले पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन माना जा रहा है कि कंपनी इस निर्णय को चुनौती दे सकती है या फिर अपने सिस्टम में सुधार के लिए नई नीतियां लागू कर सकती है।
यह फैसला डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं को दर्शाता है। आने वाले समय में सरकारों और नियामक संस्थाओं द्वारा सोशल मीडिया कंपनियों पर और सख्त नियम लागू किए जाने की संभावना भी जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि माता-पिता और अभिभावकों को भी बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर नजर रखने की जरूरत है, ताकि वे डिजिटल दुनिया में सुरक्षित रह सकें और उनके मानसिक स्वास्थ्य पर किसी प्रकार का नकारात्मक प्रभाव न पड़े।