काम मांगने पहुंचे मजदूरों को नहीं मिला रोजगार, घोटवानी में मनरेगा कार्यों पर उठे सवाल

दुर्ग जिले के धमधा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत घोटवानी में मनरेगा के तहत रोजगार मांगने पहुंचे मजदूरों को लगातार दो दिनों तक काम नहीं मिलने का मामला सामने आया है। ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत द्वारा मुनादी कर श्रमिकों को बुलाया गया, लेकिन तकनीकी कारणों का हवाला देकर उन्हें वापस भेज दिया गया। ग्रामीणों ने मामले की जांच कर सभी पात्र मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराने की मांग की है।

Jun 3, 2026 - 12:00
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काम मांगने पहुंचे मजदूरों को नहीं मिला रोजगार, घोटवानी में मनरेगा कार्यों पर उठे सवाल

UNITED NEWS OF ASIA. हेमंत पाल, धमधा l केंद्र और राज्य सरकारें महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को वर्ष में 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराने का दावा करती हैं, लेकिन दुर्ग जिले के धमधा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत घोटवानी में इसकी जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े हो रहे हैं। यहां रोजगार की उम्मीद लेकर कार्यस्थल पहुंचे मजदूरों को लगातार दूसरे दिन भी काम नहीं मिल सका, जिससे ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

ग्रामीणों के अनुसार पंचायत द्वारा गांव में मुनादी कर मनरेगा कार्य शुरू होने की जानकारी दी गई थी। सूचना मिलने के बाद बड़ी संख्या में मजदूर निर्धारित समय पर कार्यस्थल पहुंचे। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें सुबह से कई घंटों तक इंतजार कराया गया, लेकिन बाद में विभिन्न कारण बताकर वापस भेज दिया गया। मजदूरों का आरोप है कि कभी केवाईसी अधूरा होने, कभी ऑनलाइन फोटो अपलोड नहीं होने और कभी तकनीकी समस्या का हवाला देकर रोजगार देने से इनकार कर दिया गया।

ग्रामीणों का कहना है कि यह स्थिति केवल एक दिन की नहीं बल्कि लगातार दो दिनों से बनी हुई है। मजदूर रोज काम की उम्मीद लेकर पहुंच रहे हैं, लेकिन उन्हें निराश होकर घर लौटना पड़ रहा है। इससे उन परिवारों की परेशानी बढ़ गई है, जिनकी आजीविका मुख्य रूप से मनरेगा मजदूरी पर निर्भर है।

मामले को लेकर ग्रामीणों ने पंचायत की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि जब उन्होंने काम नहीं मिलने के कारणों की जानकारी लेने का प्रयास किया तो उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। कुछ ग्रामीणों का कहना है कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनने के बजाय उन्हें नजरअंदाज किया गया। इससे मजदूरों में असंतोष और बढ़ गया है।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि किसी मजदूर का केवाईसी या अन्य आवश्यक दस्तावेजी कार्य लंबित था तो पंचायत को पहले ही इसकी जानकारी देनी चाहिए थी। बिना तैयारी के मुनादी कर मजदूरों को बुलाना और घंटों इंतजार कराने के बाद वापस भेज देना उचित नहीं है। इससे मजदूरों का समय और संभावित आय दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

गांव के लोगों ने आरोप लगाया है कि मनरेगा कार्यों में पारदर्शिता की कमी दिखाई दे रही है। उनका कहना है कि कुछ लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि वास्तविक जरूरतमंद मजदूरों को काम नहीं मिल पा रहा है। इस स्थिति ने पंचायत प्रशासन के प्रति ग्रामीणों का भरोसा कमजोर किया है।

मनरेगा कानून के तहत रोजगार मांगने वाले पात्र श्रमिकों को निर्धारित समय सीमा में काम उपलब्ध कराना संबंधित पंचायत और प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि जब वे स्वयं काम मांगने पहुंच रहे हैं तो उन्हें रोजगार क्यों नहीं दिया जा रहा। यह स्थिति योजना के उद्देश्य और क्रियान्वयन दोनों पर सवाल खड़े करती है।

ग्रामीणों ने जनपद पंचायत, जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। साथ ही सभी पात्र मजदूरों को तत्काल रोजगार उपलब्ध कराने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई करने की मांग भी की गई है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो वे सामूहिक रूप से उच्च अधिकारियों के समक्ष शिकायत दर्ज कर आंदोलन का रास्ता अपना सकते हैं।

नोट : यह समाचार ग्रामीणों द्वारा लगाए गए आरोपों और उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। संबंधित पंचायत प्रशासन या अधिकारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।