इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में जिले के विभिन्न ग्रामों जैसे घोठिया, जमुनिया, जैतपुरी, नेवारी, बिरकोना सहित अन्य गांवों के करीब 50 युवाओं, महिलाओं और किसानों ने भाग लिया। प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य प्रतिभागियों को आधुनिक तकनीकों से जोड़कर उनकी आय में वृद्धि करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना था।
औषधीय एवं सुगंधित खेती पर जोर
प्रशिक्षण के दौरान वैज्ञानिक डॉ. येमन देवांगन ने प्रतिभागियों को औषधीय और सुगंधित फसलों की वैज्ञानिक खेती के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने लेमनग्रास, सिट्रोनेला, पामारोजा, गिलोय, पुदीना, ब्राम्ही, अश्वगंधा, सर्पगंधा, नीम, तुलसी, अदरक, हल्दी, खस और बच जैसी फसलों की उन्नत खेती की तकनीकों पर प्रकाश डाला।
उन्होंने इन फसलों के औषधीय महत्व, बाजार में मांग और मूल्य संवर्धित उत्पादों जैसे इत्र, साबुन और अगरबत्ती बनाने की प्रक्रिया का लाइव प्रदर्शन भी किया, जिससे प्रतिभागियों में उत्साह देखा गया।
वैज्ञानिकों ने दी महत्वपूर्ण जानकारी
डॉ. एलिस तिर्की ने विभिन्न सुगंधित और औषधीय पौधों की पहचान, गुण और उपयोग के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने निम्बूघास, पामारोसा, तुलसी, पुदीना, केवड़ा सहित कई पौधों की उन्नत किस्मों के बारे में बताया।
वहीं, कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. बी.पी. त्रिपाठी ने औषधीय एवं सुगंधित पौधों की व्यावसायिक खेती की संभावनाओं पर जोर देते हुए इसे किसानों के लिए आय बढ़ाने का बेहतर विकल्प बताया।
प्रक्षेत्र भ्रमण से मिला व्यावहारिक अनुभव
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को कृषि विज्ञान केंद्र के प्रक्षेत्र नेवारी में समन्वित कृषि प्रणाली के तहत पशुपालन, मुर्गीपालन, मछलीपालन और बटेर पालन इकाइयों का भ्रमण भी कराया गया। इससे उन्हें व्यावहारिक जानकारी प्राप्त हुई।
प्रमाण पत्र और पौधों का वितरण
कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र एवं औषधीय पौधे प्रदान किए गए और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की गई।
इस अवसर पर कृषि विज्ञान केंद्र के इंजीनियर टी.एस. सोनवानी, डॉ. बी.एस. परिहार, डॉ. एन.सी. बंजारा और डॉ. सी.पी. रहांगडाले सहित अन्य विशेषज्ञ उपस्थित रहे।
कुल मिलाकर, यह प्रशिक्षण कार्यक्रम अनुसूचित जाति वर्ग के युवाओं और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और उनकी आय बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।