केशकाल में मावली माता फूल मड़ाई मेला: बस्तर की आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम
केशकाल घाटी स्थित मावली माता मंदिर में आयोजित फूल मड़ाई मेले में बस्तर की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक एकता का भव्य दृश्य देखने को मिला। विदेशी पर्यटकों की उपस्थिति ने इस आयोजन को वैश्विक पहचान दिलाई।
UNITED NEWS OF ASIA. रामकुमार भारतद्वाज कांकेर/केशकाल। बस्तर की समृद्ध आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक एकता का अद्भुत नजारा केशकाल घाटी स्थित प्रसिद्ध मावली माता मंदिर में आयोजित फूल मड़ाई मेले में देखने को मिला। इस मेले में बस्तर संभाग के विभिन्न क्षेत्रों से देवी-देवताओं की पारंपरिक उपस्थिति ने पूरे वातावरण को श्रद्धा और भक्ति से सराबोर कर दिया।
मेला बस्तर संभाग के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले केशकाल में आयोजित हुआ, जहां कांकेर जिले के दबेना और सरोना गांव से देवी-देवता पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पहुंचे। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वेशभूषा के साथ निकली शोभायात्राओं ने मेले को और भी आकर्षक बना दिया।
मेले के दौरान सभी देवी-देवताओं ने मावली माता के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार देवी-देवता स्थानीय थाना पहुंचे, जहां थाना प्रभारी द्वारा विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। यह परंपरा बस्तर की अनूठी सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती है, जहां आस्था और प्रशासन का एक विशेष समन्वय देखने को मिलता है।
पूजा-अर्चना के पश्चात सभी देवी-देवता पुनः मेला स्थल लौटे और दाई परिक्रमा कर श्रद्धा भाव के साथ अपने-अपने गांवों के लिए विदा हुए। इस दौरान हजारों श्रद्धालु इस धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन के साक्षी बने।
इस वर्ष मेले की खास बात यह रही कि इसमें अंतरराष्ट्रीय आकर्षण भी देखने को मिला। लंदन और फ्रांस से आए विदेशी पर्यटक भी इस आयोजन में शामिल हुए। उन्होंने बस्तर की लोक संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक आस्था को करीब से देखा और अपने कैमरों में इन दुर्लभ क्षणों को कैद किया।
विदेशी मेहमानों की मौजूदगी ने इस मेले को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत न केवल देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोगों को आकर्षित कर रही है।
मावली माता का फूल मड़ाई मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह बस्तर की सांस्कृतिक एकता, परंपराओं और लोक जीवन का जीवंत उदाहरण है। यहां आकर लोगों को न केवल आध्यात्मिक शांति मिलती है, बल्कि वे आदिवासी संस्कृति की गहराई को भी महसूस करते हैं।
इस प्रकार, केशकाल में आयोजित यह मेला बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को संजोए हुए एक महत्वपूर्ण आयोजन के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है, जो हर वर्ष हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।