कवर्धा वन मंडल में साल हार्टवुड बोरर नियंत्रण पर प्रशिक्षण, वन संरक्षण को मिलेगी नई दिशा

कवर्धा वन मंडल में साल हार्टवुड बोरर कीट के समन्वित प्रबंधन पर एक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस प्रशिक्षण में वन अधिकारियों और कर्मचारियों को कीट नियंत्रण की आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक उपायों की जानकारी दी गई।

Apr 29, 2026 - 12:41
Apr 29, 2026 - 12:57
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कवर्धा वन मंडल में साल हार्टवुड बोरर नियंत्रण पर प्रशिक्षण, वन संरक्षण को मिलेगी नई दिशा

UNITED NEWS OF ASIA. सौरभ नामदेव, कवर्धा l छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में साल वृक्षों को नुकसान पहुंचाने वाले खतरनाक कीट “साल हार्टवुड बोरर” के प्रभावी नियंत्रण के लिए कवर्धा वन मंडल में एक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। भारतीय वन शिक्षा संस्थान (ICFRE-TFRI), जबलपुर के सहयोग से आयोजित इस प्रशिक्षण का उद्देश्य वन अधिकारियों और कर्मचारियों को इस कीट के समन्वित प्रबंधन के लिए आवश्यक वैज्ञानिक जानकारी और व्यावहारिक कौशल प्रदान करना था।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में कवर्धा वन मंडल के विभिन्न क्षेत्रों से आए वन अधिकारियों और कर्मचारियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने साल हार्टवुड बोरर (Hoplocerambyx spinicornis) के जीवन चक्र, पारिस्थितिकी, मौसमी प्रकोप और इसके प्रभावों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। यह कीट साल वृक्षों के तनों में छेद कर उनके हार्टवुड को नष्ट कर देता है, जिससे लकड़ी की गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ता है और वनों की उत्पादकता में कमी आती है।

विशेषज्ञों ने बताया कि हाल के वर्षों में छत्तीसगढ़ के साल वनों में इस कीट का प्रकोप तेजी से बढ़ा है, जिससे वन संरक्षण और प्रबंधन के सामने नई चुनौतियां उत्पन्न हो गई हैं। इस स्थिति को देखते हुए समय पर और प्रभावी उपाय अपनाना अत्यंत आवश्यक हो गया है।

प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को समन्वित कीट प्रबंधन (IPM) की विभिन्न तकनीकों से अवगत कराया गया। इसमें “ट्रैप-ट्री विधि”, प्रभावित पेड़ों की पहचान, वन-वैज्ञानिक उपायों का उपयोग और कीट नियंत्रण के आधुनिक तरीकों की जानकारी शामिल थी। क्षेत्रीय प्रदर्शन के माध्यम से प्रतिभागियों को कीट के विभिन्न जीवन चरणों की पहचान, संक्रमित वृक्षों का वर्गीकरण और नियंत्रण के व्यावहारिक उपाय सिखाए गए।

इस कार्यक्रम को सफल बनाने में कई वरिष्ठ अधिकारियों और विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। प्रमुख मुख्य वन संरक्षक एवं निदेशक, एसएफआरटीआई रायपुर  तपेश कुमार झा, आईसीएफआरई-टीएफआरआई जबलपुर की निदेशक डॉ. नीलू सिंह, मुख्य वन संरक्षक दुर्ग सर्कल  एम. मर्सी बेला और वन मंडलाधिकारी कवर्धा निखिल अग्रवाल ने इस पहल को प्रभावी दिशा प्रदान की। साथ ही टीएफआरआई के वैज्ञानिकों ने तकनीकी मार्गदर्शन देकर प्रशिक्षण को समृद्ध बनाया।

कवर्धा वन मंडल के लिए यह प्रशिक्षण कार्यक्रम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे वन विभाग को साल वनों को इस खतरनाक कीट से बचाने के लिए एक सुदृढ़ रणनीति विकसित करने में मदद मिलेगी। इसके परिणामस्वरूप न केवल वनों के स्वास्थ्य में सुधार होगा, बल्कि लकड़ी की गुणवत्ता और उत्पादन में भी वृद्धि होगी।

इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम वन संरक्षण के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोलते हैं और अधिकारियों को आधुनिक तकनीकों से लैस करते हैं। इससे भविष्य में कीट प्रबंधन के बेहतर परिणाम मिलने की उम्मीद है, जो राज्य के वन संसाधनों की सुरक्षा और आर्थिक विकास दोनों के लिए लाभकारी साबित होगा।