उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने विधेयक पर चर्चा के दौरान कहा कि यह कानून नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा को प्राथमिकता देता है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1968 से लागू पुराने प्रावधान वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप पर्याप्त नहीं थे, जिसके कारण नए और प्रभावी कानून की आवश्यकता महसूस की गई।
धर्म परिवर्तन प्रक्रिया होगी पारदर्शी
विधेयक में धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को स्पष्ट और पारदर्शी बनाने के लिए कई प्रावधान किए गए हैं। अब धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को पहले प्राधिकृत अधिकारी के समक्ष आवेदन देना होगा। इसके बाद निर्धारित समय सीमा में सूचना सार्वजनिक की जाएगी और आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी। जांच पूरी होने के बाद ही प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा से धर्म चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी, लेकिन यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई भी धर्म परिवर्तन दबाव, प्रलोभन या भय के कारण न हो।
पंजीयन और निगरानी व्यवस्था
विधेयक के तहत धर्मांतरण कराने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं के लिए पंजीयन अनिवार्य किया गया है। उन्हें हर वर्ष संबंधित अधिकारी को विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। साथ ही ग्राम सभा की भागीदारी भी सुनिश्चित की गई है, जिससे स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।
विवाह को धर्म परिवर्तन का आधार नहीं माना गया है, और विवाह के बाद भी धर्म परिवर्तन के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होगा।
अवैध धर्मांतरण पर कड़े दंड
विधेयक में अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए सख्त दंड का प्रावधान किया गया है। सामान्य मामलों में 7 से 10 वर्ष तक की सजा और न्यूनतम 5 लाख रुपये जुर्माना निर्धारित किया गया है। विशेष वर्ग (महिला, अनुसूचित जाति, जनजाति, नाबालिग) के मामलों में सजा 10 से 20 वर्ष तक और जुर्माना 10 लाख रुपये तक हो सकता है।
सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास और न्यूनतम 25 लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान किया गया है। वहीं भय, प्रलोभन या धन के माध्यम से धर्मांतरण कराने पर भी कड़ी सजा निर्धारित की गई है।
पीड़ितों के लिए विशेष प्रावधान
विधेयक में पीड़ितों के हितों का भी विशेष ध्यान रखा गया है। यदि किसी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन दबाव, धोखे या लालच के कारण किया गया पाया जाता है, तो उसे पीड़ित मानते हुए न्यायालय द्वारा क्षतिपूर्ति दिलाने का प्रावधान किया गया है।
सामाजिक समरसता पर जोर
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने विश्वास जताया कि यह कानून सामाजिक समरसता को मजबूत करेगा और राज्य में संतुलित एवं शांतिपूर्ण वातावरण स्थापित करने में सहायक होगा। उन्होंने कहा कि स्पष्ट कानूनी व्यवस्था से अनावश्यक विवाद और तनाव की स्थिति को कम किया जा सकेगा।
कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 को राज्य में कानून व्यवस्था को मजबूत करने और धार्मिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।