दिल्ली हाईकोर्ट ने गैंगरेप पीड़िता को 3 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश बरकरार रखा, रेलवे की याचिका खारिज

दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 2012 में बिहार में ट्रेन में गैंगरेप की शिकार महिला को 3 लाख रुपये मुआवजा देने के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के आदेश को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना रेलवे की जिम्मेदारी है और सुरक्षा में चूक होने पर वह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।

Aug 4, 2026 - 15:50
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दिल्ली हाईकोर्ट ने गैंगरेप पीड़िता को 3 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश बरकरार रखा, रेलवे की याचिका खारिज

UNITED NEWS OF ASIA. नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 2012 में बिहार में एक पैसेंजर ट्रेन में गैंगरेप की शिकार महिला को 3 लाख रुपये मुआवजा देने के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के आदेश को बरकरार रखते हुए भारतीय रेलवे की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि वैध टिकट लेकर यात्रा कर रहे यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना रेलवे की जिम्मेदारी है और वह इस दायित्व से केवल इसलिए नहीं बच सकता कि अपराध बाहरी लोगों ने किया था।

जस्टिस अमित बंसल की पीठ ने कहा कि रेलवे अधिनियम के तहत इस प्रकार का हिंसक अपराध "अनहोनी घटना" (Untoward Incident) की श्रेणी में आता है। इसलिए पीड़िता को मुआवजा दिए जाने का NHRC का आदेश पूरी तरह उचित है।

रेलवे ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि मुआवजा तय करने का अधिकार केवल रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के पास है और NHRC को ऐसा आदेश देने का अधिकार नहीं है। रेलवे का यह भी कहना था कि घटना में उसके किसी कर्मचारी की भूमिका नहीं थी तथा अपराधियों को बाद में दोषी ठहराया जा चुका है। इसके अलावा रेलवे ने दलील दी कि घटना स्टेशन पर खड़ी ट्रेन में हुई थी, जहां कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी गवर्नमेंट रेलवे पुलिस (GRP) की थी।

हालांकि हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि रेलवे अधिनियम के प्रावधान केवल ट्रेन के भीतर होने वाली घटनाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रेलवे प्लेटफॉर्म और रेलवे परिसर में होने वाले हिंसक हमलों पर भी लागू होते हैं। ऐसे मामलों में रेलवे सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पीड़िता को त्वरित आर्थिक सहायता देने की सिफारिश कर अपने अधिकारों का वैध उपयोग किया है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मानवाधिकार आयोग कोई "बिना दांत का बाघ" नहीं है, बल्कि जीवन और सम्मान के अधिकार का प्रभावी संरक्षक है। आयोग की सिफारिशों को संबंधित संस्थाएं अदालत में चुनौती दे सकती हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने बताया कि वर्ष 2016 में रेलवे की याचिका स्वीकार करते समय NHRC के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई गई थी और रेलवे को 3 लाख रुपये की राशि अदालत के रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा कराने का निर्देश दिया गया था। अब याचिका खारिज होने के बाद अदालत ने रजिस्ट्री को आदेश दिया है कि जमा की गई राशि ब्याज सहित पीड़िता को दो सप्ताह के भीतर प्रदान की जाए।

यह मामला 27 अगस्त 2012 का है, जब बिहार के एक रेलवे स्टेशन पर खड़ी पैसेंजर ट्रेन में एक महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना हुई थी। पीड़िता के पिता ने मार्च 2013 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी। जांच के बाद आयोग ने माना कि रेलवे परिसर में हुई इस घटना में सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक हुई थी और रेलवे बोर्ड को पीड़िता को 3 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था। अब दिल्ली हाईकोर्ट ने उस आदेश को बरकरार रखते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना रेलवे की कानूनी जिम्मेदारी है।