MMI नारायण मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल, रायपुर के वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. दिपेश मास्के के अनुसार, टीबी एक बैक्टीरियल संक्रमण है जो मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करता है, लेकिन यह शरीर के अन्य अंगों जैसे मस्तिष्क, रीढ़ और किडनी को भी नुकसान पहुंचा सकता है। यह बीमारी हवा के माध्यम से फैलती है, खासकर जब संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है।
टीबी के लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं, जिससे कई बार लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं। लगातार दो सप्ताह से अधिक खांसी रहना, बुखार, रात में पसीना आना, वजन कम होना और थकान इसके प्रमुख संकेत हैं। गंभीर स्थिति में खांसी के साथ खून भी आ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच और इलाज से इस बीमारी को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।
भारत में टीबी की चुनौती को देखते हुए सरकार द्वारा राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक देश को टीबी मुक्त बनाना है। इस अभियान के तहत मुफ्त जांच, दवाइयों की उपलब्धता और मरीजों के लिए पोषण सहायता जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं।
हालांकि, टीबी के खिलाफ लड़ाई में एक बड़ी चुनौती दवा-प्रतिरोधी टीबी (MDR-TB) है। यह तब होता है जब मरीज इलाज अधूरा छोड़ देते हैं या दवाओं का सही तरीके से सेवन नहीं करते। ऐसे मामलों में इलाज लंबा और जटिल हो जाता है। इसलिए डॉक्टरों द्वारा निर्धारित पूरा उपचार लेना बेहद जरूरी है।
टीबी की रोकथाम के लिए कुछ आसान उपाय बेहद प्रभावी साबित हो सकते हैं। खांसते या छींकते समय मुंह ढकना, घर और कार्यस्थल में वेंटिलेशन बनाए रखना, और लंबे समय तक खांसी होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है। इसके साथ ही मरीजों के प्रति भेदभाव और सामाजिक कलंक को खत्म करना भी आवश्यक है, ताकि लोग बिना डर के इलाज करवा सकें।
विश्व क्षय रोग दिवस हमें यह याद दिलाता है कि टीबी का उन्मूलन केवल सरकार या स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की भागीदारी से ही संभव है। जागरूकता, समय पर उपचार और सामूहिक प्रयासों के जरिए हम एक स्वस्थ और टीबी मुक्त भारत की दिशा में मजबूत कदम बढ़ा सकते हैं।