मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इंस्टाग्राम पर ऐसे भुगतान वाले विज्ञापन दिखाई दिए, जिनमें बच्चों के यौन शोषण से संबंधित आपराधिक सामग्री का संकेत देने वाले शब्दों का उपयोग किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, इन विज्ञापनों पर क्लिक करने के बाद उपयोगकर्ताओं को अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या चैनलों की ओर भेजा जाता था, जहां कथित तौर पर अवैध सामग्री उपलब्ध कराई जा रही थी। इन दावों के बाद पूरे मामले ने गंभीर रूप ले लिया है।
सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय अब Meta से विस्तृत जवाब मांगेगा। सरकार यह भी जानना चाहती है कि कंपनी के कंटेंट मॉडरेशन और विज्ञापन समीक्षा तंत्र के बावजूद ऐसे विज्ञापन प्लेटफॉर्म तक कैसे पहुंचे। मंत्रालय द्वारा मांगे गए स्पष्टीकरण के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
इस मामले पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने भी स्वतः संज्ञान लेने की बात कही है। आयोग ने कहा है कि वह मामले पर करीबी नजर रखे हुए है और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। बच्चों के खिलाफ किसी भी प्रकार के ऑनलाइन शोषण या अवैध सामग्री को रोकना सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
इससे पहले भी केंद्र सरकार ने Meta को एक अन्य मुद्दे पर नोटिस जारी किया था। एक जुलाई को सरकार ने WhatsApp के प्रस्तावित यूजरनेम फीचर को लेकर कंपनी से स्पष्टीकरण मांगा था। सरकार ने कहा था कि जब तक इस विषय पर आवश्यक चर्चा पूरी नहीं हो जाती, तब तक इस फीचर को लागू नहीं किया जाए। इसके जवाब में WhatsApp ने सरकार से अपना पक्ष रखने के लिए तीन दिन का समय मांगा है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर सरकार लगातार सख्त रुख अपनाती रही है। सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत सोशल मीडिया कंपनियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अवैध और हानिकारक सामग्री की पहचान कर उसे समय पर हटाएं तथा कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ आवश्यक सहयोग करें।
फिलहाल सरकार द्वारा Meta से औपचारिक स्पष्टीकरण मांगा जा रहा है। इस मामले में कंपनी की प्रतिक्रिया और जांच के बाद आगे की कार्रवाई स्पष्ट होगी। बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही को लेकर यह मामला महत्वपूर्ण माना जा रहा है।