मनरेगा में 40% राज्यांश का फैसला जनता पर बोझ, रीपा को नए नाम से शुरू करना सरकार की मजबूरी: कांग्रेस

छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने राज्य मंत्रिमंडल के फैसलों पर प्रतिक्रिया देते हुए मनरेगा में 40 प्रतिशत राज्यांश को जनता पर अतिरिक्त बोझ बताया है। कांग्रेस ने कहा कि केंद्र सरकार के फैसले का विरोध करने के बजाय राज्य सरकार ने उसे स्वीकार कर लिया। साथ ही कांग्रेस ने दावा किया कि रीपा योजना को बंद करने के बाद अब सरकार उसे नए नाम से फिर शुरू करने के लिए मजबूर हुई है।

Jun 24, 2026 - 12:54
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मनरेगा में 40% राज्यांश का फैसला जनता पर बोझ, रीपा को नए नाम से शुरू करना सरकार की मजबूरी: कांग्रेस

UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर l छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने राज्य मंत्रिमंडल के हालिया फैसलों पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मनरेगा योजना में 40 प्रतिशत राज्यांश की व्यवस्था को प्रदेश की जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बताया है। कांग्रेस का कहना है कि केंद्र सरकार के फैसले का विरोध करने के बजाय राज्य सरकार ने उसे स्वीकार कर राज्य के हितों की अनदेखी की है।

प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि मनरेगा अब तक केंद्र प्रवर्तित योजना के रूप में संचालित होती रही है, लेकिन नई व्यवस्था के तहत योजना में राज्य सरकार को 40 प्रतिशत वित्तीय भागीदारी करनी होगी। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य मंत्रिमंडल ने इस व्यवस्था को मंजूरी देकर प्रदेश की जनता के साथ अन्याय किया है।

कांग्रेस का कहना है कि सरकार ने मनरेगा के लिए लगभग 4 हजार करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान किया है, जबकि पूर्व में इस योजना पर लगभग 6200 करोड़ रुपये खर्च किए जाते थे। ऐसे में काम के दिनों में वृद्धि की घोषणा के बावजूद वास्तविकता में रोजगार कार्यों में कटौती की आशंका है। कांग्रेस ने सवाल उठाया कि जब बजट कम है तो अधिक दिनों तक रोजगार उपलब्ध कराने का दावा कैसे पूरा किया जाएगा।

सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि जीरामजी कानून लागू हुए आठ महीने से अधिक समय हो चुका है और सामान्यतः जून मध्य के बाद मनरेगा कार्य बंद हो जाते हैं। ऐसे में सरकार द्वारा अब निर्णय लेने से आने वाले महीनों में रोजगार कार्य प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को केंद्र के समक्ष विरोध दर्ज कराना चाहिए था और मनरेगा का पूरा खर्च केंद्र से वहन कराने या विशेष वित्तीय सहायता की मांग करनी चाहिए थी।

कांग्रेस ने यह भी कहा कि राज्य के वित्तीय संसाधन पहले से सीमित हैं। जीएसटी व्यवस्था के तहत अधिकांश कर राजस्व केंद्र के पास जाता है, ऐसे में मनरेगा का अतिरिक्त वित्तीय भार राज्य की अन्य विकास योजनाओं को प्रभावित कर सकता है। पार्टी का आरोप है कि वर्तमान सरकार वित्तीय संकट का हवाला देकर नई योजनाएं शुरू करने में असफल रही है और अब अतिरिक्त बोझ से विकास कार्यों पर असर पड़ सकता है।

मंत्रिमंडल के एक अन्य निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस ने दावा किया कि पूर्ववर्ती सरकार की रीपा (रूरल इंडस्ट्रियल पार्क) योजना को बंद करने के बाद अब सरकार उसे नए नाम से पुनः लागू करने के लिए बाध्य हुई है। कांग्रेस का कहना है कि ग्रामीण उत्पादन, स्वरोजगार और प्रसंस्करण गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई रीपा योजना को सत्ता परिवर्तन के बाद बंद कर दिया गया था।

पार्टी के अनुसार अब सरकार ने इसी अवधारणा को ‘अटल आजीविका समृद्ध द्वार योजना’ के नाम से आगे बढ़ाने का फैसला किया है। कांग्रेस ने इसे अपनी योजनाओं की उपयोगिता की स्वीकारोक्ति बताते हुए कहा कि सरकार के पास मौलिक सोच का अभाव है और वह पूर्ववर्ती योजनाओं को नए नाम से लागू कर रही है।

कांग्रेस ने मांग की है कि राज्य सरकार मनरेगा के वित्तीय ढांचे पर पुनर्विचार करे और ग्रामीण रोजगार एवं विकास योजनाओं को प्रभावित होने से बचाने के लिए ठोस कदम उठाए।