विकास की रफ्तार में कुचला मजदूर वर्ग — औद्योगिक सुरक्षा पर सवाल, अब चाहिए ज़मीन पर कार्रवाई

छत्तीसगढ़ के प्रदेश महासचिव प्रदुमन शर्मा (अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण आयोग) ने मजदूर वर्ग की दुर्दशा पर गंभीर चिंता जताते हुए औद्योगिक सुरक्षा विभाग की निष्क्रियता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि उद्योगों में सुरक्षा रिपोर्टों की जगह ज़मीनी निरीक्षण जरूरी है, ताकि रोज़ होने वाले औद्योगिक हादसों में मजदूरों की जान बचाई जा सके। शर्मा ने कहा कि अब वक्त है “सिस्टम की चुप्पी” तोड़कर वास्तविक औद्योगिक सुरक्षा को लागू करने का।

Nov 4, 2025 - 11:35
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विकास की रफ्तार में कुचला मजदूर वर्ग — औद्योगिक सुरक्षा पर सवाल, अब चाहिए ज़मीन पर कार्रवाई

UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर। देश की आर्थिक प्रगति और औद्योगिक विकास की रफ्तार जितनी तेज़ हुई है, उतनी ही तेज़ी से मजदूर वर्ग की पीड़ा भी बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण आयोग के प्रदेश महासचिव प्रदुमन शर्मा ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि “विकास के पहिए के नीचे सबसे ज्यादा कुचला गया वर्ग मजदूर है — जो उद्योगों, फैक्ट्रियों और निर्माण स्थलों पर दिन-रात मेहनत कर देश की नींव मजबूत करता है, लेकिन वही सुरक्षा से सबसे वंचित है।”

उन्होंने कहा कि हर औद्योगिक हादसे में सबसे पहले वही मजदूर घायल या दिवंगत होता है। परिवार की जिम्मेदारी, बच्चों की पढ़ाई और रोज़ी-रोटी की चिंता उसी के सिर पर होती है, लेकिन हादसे के बाद उसे मुआवजा पाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। शर्मा ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “यह मुआवजा उद्योगपतियों की दया नहीं, बल्कि मजदूर का अधिकार है।”

प्रदुमन शर्मा ने औद्योगिक सुरक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि अधिकांश मामलों में सुरक्षा रिपोर्टें महज़ औपचारिकता बनकर रह गई हैं। “कई बार अधिकारी एसी कमरों में बैठकर सुरक्षा प्रतिवेदन को स्वीकृत कर देते हैं, बिना यह देखे कि जमीन पर मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था वास्तव में लागू भी है या नहीं।” उन्होंने कहा कि यदि सुरक्षा निरीक्षण वास्तविक रूप से किए जाएं और उद्योगों से सख्ती से पालन करवाया जाए, तो हादसों की संख्या नगण्य रह जाएगी।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि रायपुर जैसे औद्योगिक शहर में भी प्रतिदिन दो से चार फैक्ट्रियों से हादसों की खबरें आती हैं। अखबारों में खबर छपती है — “मजदूर की मशीन में फंसकर मौत” — और अगले दिन वही परिवार मुआवजे के लिए कार्यालयों के चक्कर काटता है।

शर्मा ने प्रशासनिक तंत्र से अपील करते हुए कहा कि “औद्योगिक सुरक्षा केवल रिपोर्टों में नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत में दिखाई देनी चाहिए।” उन्होंने कहा कि यदि केवल 10 प्रतिशत मामलों में भी विभाग सख्ती से कार्रवाई करे, तो हर दिन के हादसे महीनों में सिमट सकते हैं।

उन्होंने चेतावनी भरे शब्दों में कहा, “अब वक्त है सिस्टम की चुप्पी तोड़ने का। अगर मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई, तो विकास के नाम पर हो रहे हादसों की यह श्रृंखला समाज के विश्वास को तोड़ देगी।”

शर्मा ने अंत में कहा कि देश तभी सशक्त बनेगा जब उसका सबसे निचला वर्ग — मजदूर — सुरक्षित और सम्मानित महसूस करेगा। उद्योगपतियों और सरकार दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी है कि मजदूरों के लिए “सुरक्षित कार्यस्थल” केवल नारा नहीं, बल्कि वास्तविकता बने।