क्या सोशल मीडिया की रीलबाज़ी कानून से ऊपर हो गई है? पुलिस विभाग और जिला प्रशासन की भूमिका कटघरे में
CM पोस्टर विवाद, सड़क तोड़ने का वीडियो, फैक्ट्री में मारपीट और FIR—तुकाराम चंद्रवंशी की गतिविधियों ने कानून और प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े किए।
सौरभ नामदेव United News of Asia. सोशल मीडिया पर खुद को “युवा नेता” बताकर सुर्खियों में रहने वाले तुकाराम चंद्रवंशी की गतिविधियाँ अब सीधे कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द पर सवाल खड़े कर रही हैं। एक के बाद एक सामने आए मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि कानून को हाथ में लेने की प्रवृत्ति का मामला बनता जा रहा है।
पोस्टर पर गोबर, सड़क पर कुदाली और जांच में क्लीन चिट
तुकाराम चंद्रवंशी पर आरोप है कि उसने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के पोस्टर पर गोबर लगाया, फिर नई बनी राज्य की सड़क पर कुदाली मारकर उसे घटिया बताने का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल किया।
हालांकि, बाद में हुई आधिकारिक जांच में ठेकेदार को क्लीन चिट मिल गई, जिससे युवक के आरोपों की हवा निकलती नजर आई। इसके बावजूद बिना तथ्यों के सार्वजनिक रूप से बदनाम करने की कोशिश की गई।
ठेकेदार से लेकर कलेक्टर तक—शिकायतों की राजनीति
मामले को राजनीतिक रंग देने के लिए तुकाराम चंद्रवंशी द्वारा ठेकेदार के खिलाफ शिकायतें, तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को अवगत कराने और कलेक्टर को आवेदन देने की बात सामने आई है।
जानकारों का कहना है कि यह जांच से पहले माहौल बनाने की रणनीति थी, न कि जनहित की वास्तविक चिंता।
गुड फैक्ट्री में जबरन घुसपैठ, मारपीट और FIR
मामला यहीं नहीं रुका। गुड फैक्ट्री में जबरन घुसकर मारपीट, बिजली काटना, लेबर को जातिसूचक गालियाँ देना और महिला श्रमिक का हाथ पकड़ने जैसे गंभीर आरोप भी सामने आए हैं।
इन घटनाओं के संबंध में गुड फैक्ट्री संचालक के आवेदन पर पांडातराई थाने में शिकायत दर्ज हुई और एफआईआर भी कायम की गई है।
राजनीतिक पहचान बनाम कानून
बताया जा रहा है कि तुकाराम चंद्रवंशी कांग्रेस से जुड़ा रहा है, जबकि वर्तमान में प्रदेश में भाजपा की सरकार है। बावजूद इसके, गृहमंत्री विजय शर्मा के निर्वाचन क्षेत्र में—जहाँ एक पौवा शराब बेचने जैसे मामलों में भी त्वरित और सख्त कार्रवाई होती है, गंभीर अपराधों में आरोपियों को सरेआम घुमाया जाता है—
वहाँ तुकाराम चंद्रवंशी पर कार्रवाई में प्रशासन के हाथ क्यों काँप रहे हैं?
पुलिस और प्रशासन पर उठे सवाल
इस पूरे प्रकरण ने पुलिस विभाग और जिला प्रशासन की भूमिका को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
FIR के बावजूद कार्रवाई में देरी क्यों?
क्या सोशल मीडिया की रीलबाज़ी कानून से ऊपर हो गई है?
क्या राजनीतिक पहचान के चलते संरक्षण मिल रहा है?
एक ओर सरकार कानून के राज की बात करती है, वहीं दूसरी ओर रील बनाकर दबाव की राजनीति, अशोभनीय कृत्य, महिला श्रमिकों से दुर्व्यवहार और जातिसूचक गालियों जैसे मामलों में कठोर कार्रवाई का अभाव गंभीर चिंता का विषय है।
अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि प्रशासन निष्पक्ष होकर कानून के मुताबिक कार्रवाई कब करता है ?