कांग्रेस नए जिलाध्यक्ष के सामने चुनौतीयों का पहाड़,बिखरे संगठन को एकजुटता बनाना सबसे बड़ी चुनौती, पूर्व मंत्री अकबर के न आने से चर्चाओ का दौर जारी
कवर्धा जिले में कांग्रेस गंभीर संगठनात्मक संकट से जूझ रही है। नए जिलाध्यक्ष ने एकजुटता की बात जरूर की है, लेकिन लगातार चुनावी हार, जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, बाहर से आए नेताओं को तरजीह और पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर की अनुपस्थिति ने असंतोष को और गहरा कर दिया है। संगठन को बचाने के लिए अब केवल बयान नहीं, ठोस फैसलों की जरूरत है।
सौरभ नामदेव UNITED NEWS OF ASIA. कवर्धा जिला कांग्रेस कमिटी के नवनियुक्त अध्यक्ष ने ब्लॉक् अध्यक्षों के साथ विधिवत पदभार ग्रहण करके सैकड़ों कोंग्रेसियो के सामने एकजुटता की बात की ।
पर असलियत ये है की इस समय कांग्रेस गंभीर संगठनात्मक संकट से गुजर रही है। लगातार चुनावी हार से कांग्रेस कार्यकर्ता गहरी निराशा में हैं और पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। कभी मजबूत मानी जाने वाली कांग्रेस आज आपसी खींचतान और उपेक्षा की राजनीति से कमजोर होती नजर आ रही है।
सबसे बड़ा आरोप यह है कि जमीनी वजूद रखने वाले, मेहनती और संघर्षशील नेताओं की कोई पूछ-परख नहीं रह गई है। गांव-गांव, बूथ-बूथ पर पार्टी को जिंदा रखने वाले कार्यकर्ता खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं, जबकि संगठनात्मक निर्णय चंद चेहरों तक सीमित होते जा रहे हैं।
लगातार हार के बाद पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर का कवर्धा वापस न आना भी कार्यकर्ताओं की नाराजगी की बड़ी वजह बन गया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि संकट के समय नेता का क्षेत्र से दूर रहना, संगठन की कमजोरी को और उजागर करता है।
वहीं, कांग्रेस के भीतर यह भी चर्चा तेज है कि जोगी कांग्रेस और भाजपा से आए नेताओं को सीधे पद दिए जा रहे हैं। बाहरी दलों से आए नेताओं को तरजीह मिलने से पुराने, निष्ठावान कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी है। वर्षों से पार्टी के लिए संघर्ष करने वालों को नजरअंदाज करना संगठन की जड़ों को कमजोर कर रहा है।
असंतुष्ट कार्यकर्ताओं का साफ कहना है कि
“अगर बाहर से आए लोगों को ही पद मिलेंगे और जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी होगी, तो संगठन कैसे मजबूत होगा?”
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिला कांग्रेस नेतृत्व समय रहते हालात संभाल पाएगा?
क्या जमीनी नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं को सम्मान व जिम्मेदारी मिलेगी?
या फिर यही अंदरूनी कलह कांग्रेस को आने वाले चुनावों में और पीछे धकेल देगी?
कुल मिलाकर, कवर्धा कांग्रेस के सामने अस्तित्व और विश्वास दोनों को बचाने की चुनौती खड़ी है, जहां संगठन को जोड़ने के लिए सिर्फ बयान नहीं, बल्कि ठोस और ईमानदार फैसलों की जरूरत है।
वहीँ दूसरी तरफ सरकार मे रहते कांग्रेस के सिरमौर बने रहने वाले नेता आज भी संगठन से दुरी बनाकर ये साबित कर रहे है की वो केवल सत्ता सुख भोगने के लालसी है या फिर ये कहा जाये की कार्यकर्ता सिर्फ विपक्ष मे मेहनत करेंगे और वो सत्ता सुख भोगने आएंगे।