मनेन्द्रगढ़ में सिस्टम का ‘सरेंडर’? NH-43 पर सुमित्रा विश्वकर्मा प्रकरण ने खड़े किए प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल

मनेन्द्रगढ़ शहर में एनएच-43 से जुड़े सुमित्रा विश्वकर्मा प्रकरण को लेकर प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंचने के बावजूद नोटिस और कार्रवाई की फाइलें आगे नहीं बढ़ पाई हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि रसूख के आगे नगर पालिका और जिला प्रशासन की सख्ती कमजोर पड़ती दिख रही है।

Feb 23, 2026 - 13:11
 0  218
मनेन्द्रगढ़ में सिस्टम का ‘सरेंडर’? NH-43 पर सुमित्रा विश्वकर्मा प्रकरण ने खड़े किए प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल

UNITED NEWS OF ASIA. महेद्र शुक्ला, कोरिया | मनेन्द्रगढ़जब रसूख की चमक तेज हो, तो अक्सर कानून की आंखें चौंधिया जाने की चर्चा होने लगती है। मनेन्द्रगढ़ शहर में एनएच-43 से जुड़े सुमित्रा विश्वकर्मा प्रकरण को लेकर इन दिनों यही सवाल आम नागरिकों के बीच गूंज रहा है। शहर के बीचों-बीच कथित तौर पर नियमों के उल्लंघन की शिकायतें सामने आई हैं, लेकिन नगर पालिका और जिला प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, यह मामला सुमित्रा विश्वकर्मा से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसमें एनएच-43 से सटे क्षेत्र में नियमों की अनदेखी कर निर्माण और गतिविधियों का आरोप लगाया जा रहा है। नागरिकों का कहना है कि यदि यही कार्य किसी आम व्यक्ति द्वारा किया जाता, तो अब तक नोटिस, सीलिंग और जुर्माने की कार्रवाई हो चुकी होती।

फाइलों में दफन हुआ ‘नोटिस’

सूत्रों का दावा है कि इस पूरे मामले की जानकारी जिले के वरिष्ठ अधिकारियों तक पहले ही पहुंच चुकी है। चर्चा है कि कलेक्टर डॉ. राहुल बेंकेट, एसडीएम लिंगराज सिदार, एनएच से जुड़े कार्यों के एसडीओ मोहन सिंह नागरे तथा नगर पालिका के मुख्य नगर पालिका अधिकारी इशाक खान तक भी शिकायत की प्रतियां पहुंचाई जा चुकी हैं।

इसके बावजूद बड़ा सवाल यह है कि नोटिस की प्रक्रिया आखिर आगे क्यों नहीं बढ़ी? क्या किसी दबाव के चलते फाइलें टेबल से आगे नहीं बढ़ पा रहीं, या फिर यह केवल प्रशासनिक सुस्ती का मामला है?

प्रशासनिक लाचारी या गहरी साठगांठ?

शहरवासियों का कहना है कि जिस मार्ग से रोज अधिकारी गुजरते हैं, वहां हो रही कथित अनियमितताएं नजर आना स्वाभाविक है। ऐसे में ‘देखकर अनदेखा’ किए जाने की चर्चा लोगों के मन में कई तरह के संदेह पैदा कर रही है।

स्थानीय नागरिकों का यह भी आरोप है कि नियम आम लोगों के लिए अलग और प्रभावशाली लोगों के लिए अलग तरीके से लागू होते दिख रहे हैं। यही वजह है कि कार्रवाई में हो रही देरी को लेकर “कछुआ चाल” और “जानबूझकर टालमटोल” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

नगर पालिका पर भी सवाल

मामला सीधे तौर पर नगर पालिका परिषद मनेन्द्रगढ़ की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। नागरिकों का कहना है कि नगर पालिका के कायदे-कानूनों को इस प्रकरण में ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। हफ्तों बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।

जनता की मांग – पारदर्शी जांच

लोगों की मांग है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाए, यह स्पष्ट किया जाए कि नोटिस की फाइल किस स्तर पर रुकी हुई है और यदि किसी प्रकार का दबाव या हस्तक्षेप है, तो उसे भी सार्वजनिक किया जाए।

फिलहाल, मनेन्द्रगढ़‑चिरमिरी‑भरतपुर जिला में यह मामला केवल एक विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और कानून की समानता को लेकर उठता एक बड़ा सवाल बनता जा रहा है। आम नागरिक अब यह जानना चाहते हैं कि क्या सिस्टम सच में रसूख के आगे नतमस्तक है, या फिर जल्द ही इस प्रकरण में कार्रवाई का भरोसेमंद संदेश सामने आएगा।