कम बारिश की आशंका के बीच सरकार की किसानों से अपील, धान की सीधी बुवाई अपनाने की सलाह

खरीफ सीजन 2026 में कम वर्षा और खंड वर्षा की संभावनाओं को देखते हुए राज्य सरकार ने किसानों के लिए आकस्मिक कार्ययोजना जारी की है। किसानों को रोपा पद्धति के बजाय धान की सीधी बुवाई (डीएसआर) अपनाने, कम अवधि वाली फसलें लेने, दलहनी-तिलहनी फसलों की खेती बढ़ाने और जल संरक्षण के उपाय अपनाने की सलाह दी गई है।

Jul 4, 2026 - 11:06
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कम बारिश की आशंका के बीच सरकार की किसानों से अपील, धान की सीधी बुवाई अपनाने की सलाह

UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर l खरीफ सीजन 2026 में संभावित कम वर्षा और खंड वर्षा की आशंका को देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों के लिए विशेष आकस्मिक कार्ययोजना तैयार की है। अल-नीनो के संभावित प्रभाव के कारण मानसून के देर से आने, जल्दी समाप्त होने और लंबे समय तक वर्षा नहीं होने की संभावना को ध्यान में रखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को खेती के तरीकों में बदलाव अपनाने की सलाह दी है। सरकार का उद्देश्य कम वर्षा की स्थिति में भी फसल उत्पादन बनाए रखना, खेती की लागत कम करना और किसानों के जोखिम को घटाना है।

कृषि विभाग ने किसानों से धान की पारंपरिक रोपा पद्धति के बजाय डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) यानी धान की सीधी बुवाई को प्राथमिकता देने की अपील की है। विभाग के अनुसार डीएसआर तकनीक से लगभग 20 प्रतिशत पानी की बचत होती है, प्रति एकड़ करीब पांच हजार रुपये तक लागत कम आती है और फसल 12 से 15 दिन पहले तैयार हो जाती है।

सरकार ने किसानों को वर्षा शुरू होने से पहले खेतों की सफाई, समय पर जुताई, मेड़बंदी और वर्षा जल संरक्षण के उपाय अपनाने की सलाह दी है। इससे उपलब्ध पानी का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा और सूखे जैसी परिस्थितियों में भी फसलों को लाभ मिलेगा।

उच्च भूमि वाले क्षेत्रों में धान के बजाय अरहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, तिल, रामतिल और सोयाबीन जैसी दलहनी एवं तिलहनी फसलों की खेती करने की सलाह दी गई है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि ये फसलें कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं और किसानों के लिए जोखिम कम करती हैं। इसके साथ ही कतार पद्धति से बुवाई करने पर भी जोर दिया गया है, जिससे खरपतवार नियंत्रण, नमी संरक्षण और पौधों की जड़ों का बेहतर विकास संभव होता है।

बीज उपचार को भी अनिवार्य बताया गया है। किसानों को बुवाई से पहले अनुशंसित फफूंदनाशकों, कीटनाशकों और जैव उर्वरकों से बीज उपचार करने की सलाह दी गई है। यदि 15 जुलाई तक पर्याप्त अंकुरण नहीं होता है, तो पुनः बुवाई के समय सामान्य मात्रा से 10 प्रतिशत अधिक बीज उपयोग करने का सुझाव दिया गया है। वहीं जुलाई के अंत तक मूंग और उड़द तथा अगस्त में तिल, सूरजमुखी और मध्यम अवधि वाली अरहर की बुवाई करने की सलाह दी गई है।

उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर भी विशेष बल दिया गया है। कम वर्षा की स्थिति में नत्रजन उर्वरकों का सीमित उपयोग करते हुए दो प्रतिशत यूरिया घोल के पर्णीय छिड़काव या प्रति एकड़ दो बोतल नैनो यूरिया के उपयोग की सलाह दी गई है। दलहनी और तिलहनी फसलों में बुवाई के लगभग एक माह बाद दो प्रतिशत डीएपी घोल के छिड़काव की भी अनुशंसा की गई है।

राज्य सरकार ने किसानों से मौसम पूर्वानुमान के अनुसार कृषि कार्य करने, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाने, वर्षा जल का अधिकतम संग्रह करने तथा खेती से जुड़ी किसी भी तकनीकी समस्या की स्थिति में कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि महाविद्यालय अथवा अनुसंधान केंद्रों से वैज्ञानिक सलाह लेने की अपील की है। सरकार का मानना है कि इन उपायों को अपनाकर किसान कम वर्षा की स्थिति में भी बेहतर उत्पादन और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।