अल्प वर्षा से छोटेडोंगर के किसानों पर संकट, धान की फसल सूखने की कगार पर

नारायणपुर जिले के छोटेडोंगर क्षेत्र में सामान्य से कम बारिश होने के कारण धान की खेती गंभीर संकट में है। कर्ज लेकर खेती करने वाले किसान बारिश का इंतजार कर रहे हैं। समय पर वर्षा नहीं होने से फसल खराब होने और आर्थिक नुकसान की आशंका बढ़ गई है। किसानों ने क्षेत्र को सूखा प्रभावित घोषित करने और राहत पैकेज की मांग की है।

Jul 27, 2026 - 17:56
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अल्प वर्षा से छोटेडोंगर के किसानों पर संकट, धान की फसल सूखने की कगार पर

UNITED NEWS OF ASIA. संतोष मजुमदार, नारायणपुर l छत्तीसगढ़ को देश का "धान का कटोरा" कहा जाता है, लेकिन इस बार मानसून की कमजोर शुरुआत ने नारायणपुर जिले के छोटेडोंगर क्षेत्र के किसानों की चिंता बढ़ा दी है। सामान्य से करीब 60 प्रतिशत कम वर्षा होने के कारण खेतों में पर्याप्त नमी नहीं है और धान की फसल संकट में आ गई है। खेती के लिए कर्ज लेकर बीज और खाद खरीद चुके किसान अब आसमान की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं।

छोटेडोंगर क्षेत्र के अधिकांश किसान पूरी तरह वर्षा आधारित खेती पर निर्भर हैं। यहां नहर या बड़ी सिंचाई परियोजनाओं का अभाव है, जिसके कारण बारिश नहीं होने पर खेती पूरी तरह प्रभावित हो जाती है। इस क्षेत्र के लगभग 80 प्रतिशत किसान धान की खेती से ही अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। लगातार कम बारिश के चलते बुवाई का कार्य प्रभावित हुआ है और कई खेतों में दरारें पड़ने लगी हैं।

किसान उमाशंकर मांझी ने बताया कि उन्होंने इस वर्ष लगभग दो लाख रुपये का कर्ज लेकर खेती शुरू की है, लेकिन बारिश नहीं होने से पूरी मेहनत और निवेश पर संकट मंडरा रहा है। उनका कहना है कि यदि जल्द अच्छी बारिश नहीं हुई तो फसल चौपट हो जाएगी और बैंक का कर्ज चुकाना मुश्किल हो जाएगा।

एक अन्य किसान तातू राम समरथ ने बताया कि उन्होंने धान की खेती के लिए 52 हजार रुपये का कृषि ऋण लिया है। खेतों में पानी नहीं होने के कारण पौधों की बढ़वार रुक गई है और मिट्टी में दरारें पड़ने लगी हैं। किसानों का कहना है कि एक एकड़ धान की खेती में लगभग 16 हजार रुपये तक खर्च आता है। यदि उत्पादन आधा भी रह गया तो लागत निकालना भी मुश्किल होगा।

जिला कृषि विभाग के अनुसार इस वर्ष जिले में लगभग 1.20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसल की बुवाई का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिसमें लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा धान का है। अब तक केवल 50 से 55 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में ही बुवाई हो सकी है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अगले 10 दिनों के भीतर पर्याप्त वर्षा नहीं हुई तो धान उत्पादन में 30 से 40 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।

कम वर्षा का असर केवल किसानों की आय पर ही नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण अर्थतंत्र पर पड़ने की आशंका है। यदि फसल खराब होती है तो किसानों के साथ कृषि मजदूरों, व्यापारियों और स्थानीय बाजारों पर भी इसका असर दिखाई देगा। ग्रामीण परिवारों के सामने आजीविका का संकट गहरा सकता है।

स्थिति को देखते हुए किसानों ने प्रशासन और राज्य सरकार से तत्काल राहत देने की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगों में छोटेडोंगर क्षेत्र को सूखा प्रभावित घोषित करना, सूखा-रोधी धान बीज पर सब्सिडी उपलब्ध कराना, कृषि ऋण में राहत देना तथा सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना शामिल है।

किसानों का कहना है कि समय रहते आवश्यक कदम उठाए गए तो नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अब पूरे क्षेत्र की निगाहें मानसून की अगली बारिश और सरकार की राहत योजनाओं पर टिकी हुई हैं।