डॉ. ध्रुव ने कहा कि प्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने बजट को “विकसित छत्तीसगढ़” और “संकल्प” जैसे नाम दिए, लेकिन जमीनी हकीकत इससे मेल नहीं खाती। उन्होंने कहा कि सिहावा क्षेत्र की अधिकांश सड़कों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। आवागमन के दौरान लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं। कई सड़कें स्वीकृत और टेंडर होने के बावजूद आज तक नहीं बन पाई हैं।
उन्होंने बताया कि सिहावा क्षेत्र महानदी का उद्गम स्थल है, इसके बावजूद नदी के दोनों किनारों पर तटबंध निर्माण की अत्यंत आवश्यकता है, लेकिन इसके लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं किया गया। बरबाधा डैम के लिए पूर्व में स्वीकृत राशि के बावजूद कार्य अधूरा पड़ा हुआ है और अब सरकार इस परियोजना के लिए बजट देने का नाम तक नहीं ले रही है।
डॉ. लक्ष्मी ध्रुव ने कहा कि क्षेत्र वन बहुल होने के बावजूद वन विकास, वन पट्टा तथा स्थानीय आजीविका से जुड़े किसी भी ठोस प्रावधान को बजट में शामिल नहीं किया गया है। सोंढूर अभयारण्य और उदंती अभयारण्य के विकास से पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता था और आदिवासी युवाओं को रोजगार मिल सकता था, लेकिन इस दिशा में बजट पूरी तरह निराशाजनक है।
उन्होंने आगे कहा कि सिहावा क्षेत्र में केवल एक महाविद्यालय है, जहां लगभग 3000 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, लेकिन वहां मूलभूत सुविधाओं का भारी अभाव है। इसके बावजूद छात्र किसी तरह अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे हैं। बजट में इस महाविद्यालय को विकसित करने के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया, जबकि बड़े शहरों के कॉलेजों के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि नगरी क्षेत्र को बड़े झाड़ के जंगलों के नाम से जाना जाता है, लेकिन यहां आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर सरकार का ध्यान नहीं है। क्षेत्र में केवल एक स्वामी आत्मानंद स्कूल है, जो सुविधाविहीन है और जहां पर्याप्त शिक्षकों की भी आवश्यकता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए डॉ. ध्रुव ने कहा कि बोरई जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में डॉक्टरों की भारी कमी है। इलाज के अभाव में कई बार मरीजों की जान चली जाती है। पर्याप्त एम्बुलेंस और आधुनिक अस्पताल सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। छोटी-छोटी बीमारियों के लिए मरीजों को धमतरी और रायपुर रेफर किया जाता है।
उन्होंने बताया कि साकरा से घटुला, बेलर और जैतपुरी तक सड़क स्वीकृत होने के बावजूद बजट का अभाव बना हुआ है। रिसगांव तक सड़क, बिजली, यातायात और पुल-पुलिया जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है। ग्रामीणों ने इन मांगों को लेकर आंदोलन भी किए, लेकिन आजादी के 78 वर्षों बाद भी क्षेत्र मूलभूत सुविधाओं से वंचित है।
मनरेगा को लेकर उन्होंने कहा कि रोजगार के अवसर लगातार कम किए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से जुड़ी योजना में कटौती क्यों की जा रही है।
डॉ. लक्ष्मी ध्रुव ने कहा कि केंद्र सरकार के नेतृत्व में नरेन्द्र मोदी द्वारा रोजगार गारंटी की बात कही जाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई पंचायतों को अब तक 100 दिन का रोजगार भी नहीं मिल पाया है। साथ ही पंचायतों के लिए वित्तीय अधिकारों पर भी बजट में कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं है।
उन्होंने अंत में कहा कि कुल मिलाकर यह बजट सिहावा विधानसभा क्षेत्र के लिए पूरी तरह निराशाजनक है और क्षेत्र के विकास के लिए इसमें कुछ भी ठोस नजर नहीं आता।