सलधा में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया हरियाली त्योहार का धार्मिक महत्व, श्रद्धालुओं को दिया आशीर्वाद

बेमेतरा जिले के ग्राम सलधा में सवा लाख शिवलिंग मंदिर निर्माण के बीच जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का चातुर्मास चल रहा है। प्रवचन के दौरान उन्होंने हरियाली त्योहार के धार्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसकी शुरुआत माता पार्वती से जुड़ी परंपरा से मानी जाती है। उन्होंने शिव परिवार और नहुष-अशोक सुंदरी की कथा भी सुनाई। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रवचन, भजन, नृत्य और आरती में सहभागिता की।

Aug 13, 2026 - 17:35
 0  4
सलधा में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया हरियाली त्योहार का धार्मिक महत्व, श्रद्धालुओं को दिया आशीर्वाद

UNITED NEWS OF ASIA. अरुण पुरेना, बेमेतरा l जिले के ग्राम सलधा में सवा लाख शिवलिंग के ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है। इसी धार्मिक स्थल पर उत्तराम्नाय ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का चातुर्मास भी चल रहा है। चातुर्मास के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रतिदिन धार्मिक आयोजनों और प्रवचन में शामिल हो रहे हैं।

कार्यक्रम की शुरुआत ग्रामवासियों द्वारा पादुका पूजन से हुई। दण्डी स्वामी ज्योतिर्मयानंद सरस्वती ने सलधा में शिवलिंग स्थापित करने वाले भक्तों के नामों की घोषणा की। इसके बाद अप्रमेय स्वामी ने विरुदावली का वाचन किया।

प्रवचन के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्व हरियाली के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने श्रद्धालुओं को हरियाली त्योहार की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि इस पर्व की परंपरा माता पार्वती से जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को बिल्वपत्र और हरी पत्तियां अर्पित की थीं, इसी परंपरा से हरियाली त्योहार का संबंध बताया जाता है।

उन्होंने कहा कि हरियाली पर्व प्रकृति, कृषि और धार्मिक आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण अवसर है। इस दिन किसान और अन्य लोग अपने कृषि एवं कामकाज में उपयोग होने वाले उपकरणों की पूजा करते हैं। उन्होंने पर्व को प्रकृति के प्रति सम्मान और आस्था से जोड़ते हुए श्रद्धालुओं को शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद दिया।

प्रवचन के दौरान शंकराचार्य ने भगवान शिव की पुत्री अशोक सुंदरी और नहुष से जुड़ी धार्मिक कथा भी सुनाई। उन्होंने बताया कि अशोक सुंदरी ने राक्षस हुंड के विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था और कहा था कि उनका विवाह वहीं होगा, जहां उनके माता-पिता निर्णय करेंगे। कथा के अनुसार बाद में नहुष का पालन-पोषण वशिष्ठ आश्रम में हुआ और उसने हुंड का वध किया। इसके बाद शुभ मुहूर्त में अशोक सुंदरी और नहुष का विवाह हुआ।

शंकराचार्य ने आगे बताया कि नहुष को कुछ समय के लिए इंद्र का पद भी प्राप्त हुआ था। ऋषियों के श्राप के कारण वह सर्प योनि में गए और बाद में भगवान कृष्ण की कृपा से श्राप से मुक्त हुए। उन्होंने शिव परिवार से जुड़ी अन्य धार्मिक कथाओं का भी उल्लेख करते हुए भद्रा और नाग कन्याओं के संबंध में श्रद्धालुओं को जानकारी दी।

उन्होंने जलाधारी और शिवलिंग की स्थापना से जुड़े धार्मिक महत्व को भी समझाया और बताया कि शिवलिंग की पूजा में शिव परिवार की अवधारणा समाहित मानी जाती है।

कार्यक्रम में दूर-दराज से पहुंचे कलाकारों ने भजन और नृत्य की प्रस्तुतियां दीं। श्रद्धालुओं ने धार्मिक कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक सहभागिता की और सामूहिक रूप से आरती की।

चातुर्मास के दौरान शंकराचार्य की दैनिक धार्मिक दिनचर्या भी निर्धारित है। वे प्रतिदिन सुबह 4:30, 6:45, 9:45, शाम 4:45 और 6:45 बजे पूजन करते हैं। सुबह 8 से 9:30 बजे तक वेदांत पाठ आयोजित होता है। दोपहर 2:30 बजे से सत्संग और प्रवचन का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर धार्मिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान का लाभ ले रहे हैं।