बस्तर की थाली में लौटा बोड़ा का स्वाद, जंगली मशरूम से बढ़ी आदिवासी परिवारों की आय
मानसून की शुरुआत के साथ बस्तर के जंगलों में बोड़ा निकलना शुरू हो गया है। स्वाद और पोषण से भरपूर यह जंगली मशरूम स्थानीय बाजारों में अच्छी कीमत पर बिक रहा है, जिससे आदिवासी परिवारों की आय में भी बढ़ोतरी हो रही है।
UNITED NEWS OF ASIA. संतोष मजुमदार, नारायणपुर | मानसून की पहली बारिश के साथ ही बस्तर के घने जंगलों में बोड़ा की आमद शुरू हो गई है। साल वृक्षों के पुराने पेड़ों के नीचे नमी वाली जमीन पर उगने वाला यह जंगली मशरूम आदिवासी बहुल बस्तर क्षेत्र की थाली में विशेष स्थान रखता है। स्थानीय भाषा में बोड़ा के नाम से प्रसिद्ध यह मशरूम अपने अनूठे स्वाद और पोषण गुणों के कारण लोगों की पहली पसंद बना हुआ है।
ग्रामीणों के अनुसार जून से सितंबर तक बोड़ा का सीजन रहता है। बारिश के शुरुआती दिनों में जंगलों में इसकी भरपूर उपलब्धता देखने को मिलती है। सुबह के समय ग्रामीण महिलाएं टोकरी लेकर जंगलों में पहुंचती हैं और बोड़ा एकत्रित कर घर लाती हैं। इसके बाद इसका उपयोग घरेलू भोजन में किया जाता है, वहीं अतिरिक्त मात्रा को स्थानीय हाट-बाजारों में बेचकर आय अर्जित की जाती है।
बस्तर के विभिन्न साप्ताहिक बाजारों में ताजा बोड़ा 300 से 500 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रहा है। अच्छी मांग और बेहतर कीमत मिलने से आदिवासी महिलाओं एवं ग्रामीण परिवारों को मानसून के मौसम में अतिरिक्त आमदनी का स्रोत प्राप्त हो रहा है। यही कारण है कि बोड़ा को स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
पोषण विशेषज्ञों के अनुसार बोड़ा पोषक तत्वों से भरपूर प्राकृतिक खाद्य पदार्थ है। इसमें प्रोटीन की अच्छी मात्रा पाई जाती है, जो शाकाहारी लोगों के लिए एक उत्कृष्ट विकल्प माना जाता है। इसके अलावा इसमें विटामिन-बी कॉम्प्लेक्स, विटामिन-डी, आयरन, पोटैशियम, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट तत्व मौजूद रहते हैं। ये शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, पाचन तंत्र को मजबूत बनाने, ऊर्जा प्रदान करने तथा हड्डियों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में सहायक माने जाते हैं।
बस्तर के आदिवासी समुदायों में बोड़ा से कई पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं। इसे सब्जी, भुजिया, पकोड़े और अचार के रूप में बड़े चाव से खाया जाता है। इसके विशेष स्वाद के कारण स्थानीय लोगों के अलावा बाहर से आने वाले पर्यटक भी इसे पसंद करते हैं।
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बोड़ा बस्तर क्षेत्र की महत्वपूर्ण गैर-काष्ठ वनोपजों में शामिल है। यह न केवल स्थानीय लोगों के पोषण का स्रोत है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करता है। मानसून के दौरान बोड़ा का संग्रहण और विक्रय अनेक परिवारों के लिए रोजगार और आय का महत्वपूर्ण माध्यम बन जाता है।