मामले में पीड़िता ने आरोप लगाया है कि संयुक्त खाते की जमीन को बिना उसकी सहमति के अलग कर दिया गया और उसके पैतृक अधिकारों को कागजों में समाप्त कर दिया गया। इस प्रक्रिया में संबंधित पटवारी और अन्य अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
आरोपों के अनुसार, अभिलेखों में संशोधन करते समय आवश्यक जांच और प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। पीड़िता का कहना है कि उसे इस पूरे मामले की जानकारी बाद में मिली, जब जमीन का बंटवारा और हस्तांतरण हो चुका था। उसने आरोप लगाया कि इस कार्य में राजस्व विभाग के कुछ कर्मचारियों और स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत हो सकती है।
यह भी कहा जा रहा है कि राजस्व संहिता की धारा 115, जो आमतौर पर लिपिकीय त्रुटियों के सुधार के लिए उपयोग की जाती है, का इस्तेमाल इस मामले में विवादित तरीके से किया गया। बिना पर्याप्त दस्तावेजी प्रमाण और जांच रिपोर्ट के भूमि अभिलेखों में बदलाव किए जाने के आरोप सामने आए हैं।
मामले में संबंधित अधिकारियों द्वारा उचित सत्यापन किया गया या नहीं, यह भी जांच का विषय बना हुआ है। डिजिटल रिकॉर्ड में बदलाव की तिथि और प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
पीड़िता ने बताया कि उसने न्याय के लिए प्रशासनिक कार्यालयों के कई चक्कर लगाए, लेकिन अब तक उसे संतोषजनक जवाब या राहत नहीं मिल पाई है। अंततः उसने अपनी बात सार्वजनिक मंच और मीडिया के माध्यम से सामने रखी है।
इस पूरे प्रकरण ने न केवल एक परिवार के भीतर विवाद को उजागर किया है, बल्कि यह भी संकेत दिया है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए गंभीर चुनौती हो सकती है।
मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर भी चर्चा तेज हो गई है और लोगों में यह मांग उठ रही है कि इसकी निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। यदि किसी भी स्तर पर अनियमितता या नियमों की अनदेखी पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
फिलहाल प्रशासन की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। ऐसे में अब सबकी नजरें जिला प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और पीड़ित पक्ष को न्याय कब तक मिल पाता है।