AIIMS की स्थापना में राजकुमारी अमृत कौर की भूमिका: इतिहास, तथ्य और श्रेय का विवाद
AIIMS की स्थापना को लेकर लंबे समय से यह धारणा प्रचलित रही है कि इसे पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बनाया। हालांकि ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री रहीं राजकुमारी अमृत कौर की भूमिका निर्णायक रही। जमीन दान से लेकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग और AIIMS अधिनियम 1956 तक, उनकी पहल और संघर्ष ने संस्थान को आकार दिया। श्रेय को लेकर यह विषय आज भी बहस का केंद्र है।
UNITED NEWS OF ASIA. प्रदीप पाटकर,कोरिया | भारत के प्रमुख चिकित्सा संस्थान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की स्थापना को लेकर इतिहास में अक्सर यह पंक्ति दोहराई जाती रही है कि “नेहरू ने AIIMS बनाया।” लेकिन कई इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का मानना है कि यह कथन अधूरा है और इसके पीछे एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व का योगदान अपेक्षाकृत कम आंका गया—राजकुमारी अमृत कौर।
स्वतंत्रता के बाद के प्रारंभिक वर्षों में भारत आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियों से जूझ रहा था। उसी दौर में राजकुमारी अमृत कौर देश की पहली केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री बनीं। आधुनिक चिकित्सा शिक्षा और शोध के लिए एक विश्वस्तरीय संस्थान की परिकल्पना उन्होंने ही की और इसे साकार करने के लिए लगातार प्रयास किए।
AIIMS दिल्ली, अंसारी नगर में लगभग 190 एकड़ भूमि पर स्थित है। कई स्रोतों के अनुसार यह भूमि राजकुमारी अमृत कौर की पारिवारिक संपत्ति थी, जिसे उन्होंने जनस्वास्थ्य के उद्देश्य से दान में दिया। यह तथ्य संस्थान की नींव में उनके व्यक्तिगत त्याग और प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने न्यूजीलैंड और अन्य अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से तकनीकी व वित्तीय सहयोग जुटाने में भी अहम भूमिका निभाई, जिससे आधुनिक उपकरण, प्रशिक्षण और विशेषज्ञता उपलब्ध हो सकी।
AIIMS अधिनियम, 1956 को पारित कराने में भी अमृत कौर की सक्रियता निर्णायक मानी जाती है। प्रशासनिक सुस्ती और नीतिगत अड़चनों के बावजूद उन्होंने लगातार दबाव बनाकर संस्थान के कानूनी ढांचे को आकार दिया। आलोचकों का तर्क है कि राजनीतिक नेतृत्व ने इस प्रक्रिया में औपचारिक स्वीकृतियां दीं, जबकि ज़मीनी स्तर पर काम अमृत कौर के प्रयासों से आगे बढ़ा।
यह भी सच है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने AIIMS को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान मानते हुए उसका समर्थन किया और सार्वजनिक मंचों पर इसकी परिकल्पना को प्रस्तुत किया। परंतु श्रेय के प्रश्न पर आज बहस इसलिए होती है क्योंकि राजकुमारी अमृत कौर के योगदान का उल्लेख सार्वजनिक विमर्श और पाठ्यपुस्तकों में अपेक्षाकृत सीमित रहा।
आज AIIMS को देखते हुए यह कहना अधिक संतुलित होगा कि यह संस्था एक व्यक्ति नहीं, बल्कि कई प्रयासों का परिणाम है—जिसमें राजकुमारी अमृत कौर की भूमिका आधारशिला जैसी थी। AIIMS की विरासत केवल एक भवन या संस्थान नहीं, बल्कि उस दृष्टि की कहानी है जिसमें निजी संपत्ति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और राजनीतिक इच्छाशक्ति को जनस्वास्थ्य के लिए समर्पित किया गया।