प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2025 के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में वाड्रफनगर का यह निर्वाचन क्षेत्र अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि निर्वाचित उम्मीदवार ने नामांकन के समय स्वयं को ‘गोंड’ जाति का बताते हुए एक शपथ पत्र प्रस्तुत किया, जिसके आधार पर उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति मिल गई।
हालांकि शिकायत में यह दावा किया गया है कि उम्मीदवार के इस जातिगत दावे पर नामांकन के समय ही आपत्ति जताई गई थी। शिकायतकर्ता के अनुसार संबंधित उम्मीदवार के माता-पिता और पूर्वज मूल रूप से उत्तर प्रदेश के निवासी हैं, जिनका छत्तीसगढ़ या अविभाजित मध्य प्रदेश से कोई प्रमाणिक संबंध नहीं है।
शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि उम्मीदवार ने अब तक किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया है। केवल एक निजी शपथ पत्र के आधार पर चुनाव लड़ना नियमों के विरुद्ध बताया जा रहा है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि बिना वैध दस्तावेजों के उम्मीदवार को चुनाव लड़ने की अनुमति कैसे दी गई।
मामले को लेकर शिकायतकर्ता ने संबंधित दस्तावेजों के साथ औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है और पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि आरक्षण व्यवस्था के दुरुपयोग का भी गंभीर मामला है।
इस विवाद के सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। कई लोगों का मानना है कि यदि इस तरह के मामलों की समय रहते जांच नहीं की गई, तो इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए संबंधित उम्मीदवार के पास सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध जाति प्रमाण पत्र होना अनिवार्य है। केवल शपथ पत्र के आधार पर इस प्रकार का दावा करना नियमों के अनुरूप नहीं माना जाता।
फिलहाल इस मामले में प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अब सभी की नजरें जांच प्रक्रिया और प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि आरोपों की पुष्टि होती है, तो संबंधित निर्वाचित सदस्य के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई की जा सकती है और चुनाव परिणाम भी प्रभावित हो सकता है।