शासकीय विद्यालयों में धार्मिक मंत्रों के आदेश का विरोध, संविधान आधारित प्रार्थनाओं की मांग

आदिवासी छात्र युवा संगठन छत्तीसगढ़ ने शासकीय विद्यालयों में एक धर्म विशेष के मंत्रों के अनिवार्य पाठ के आदेश का विरोध करते हुए इसे संविधान की मूल भावना के विपरीत बताया है। संगठन ने विद्यालयों में संविधान की प्रस्तावना, राष्ट्रीय एकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पर्यावरण संरक्षण पर आधारित गतिविधियों को बढ़ावा देने की मांग की है।

Jun 17, 2026 - 16:34
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शासकीय विद्यालयों में धार्मिक मंत्रों के आदेश का विरोध, संविधान आधारित प्रार्थनाओं की मांग

UNITED NEWS OF ASIA. रोहित देहारी, पखांजूर l पखांजूर, छत्तीसगढ़ से प्राप्त जानकारी के अनुसार आदिवासी छात्र युवा संगठन छत्तीसगढ़ ने राज्य के शासकीय विद्यालयों में एक धर्म विशेष से संबंधित मंत्रों के अनिवार्य पाठ कराए जाने के आदेश का कड़ा विरोध किया है। संगठन का कहना है कि इस प्रकार का निर्णय भारतीय संविधान की मूल भावना के विपरीत है और देश की धर्मनिरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

संगठन का मानना है कि भारत एक बहुधार्मिक, बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश है, जहां सभी धर्मों और समुदायों के विद्यार्थियों को समान रूप से शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। ऐसे में किसी एक धर्म की धार्मिक प्रार्थना या मंत्र को सरकारी विद्यालयों में अनिवार्य करना संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ प्रतीत होता है।

संविधान के अनुच्छेद 28 का उल्लेख करते हुए संगठन ने कहा कि राज्य द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित शैक्षणिक संस्थानों में किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा देना वर्जित है। इसलिए विद्यालयों में धार्मिक गतिविधियों को अनिवार्य बनाना संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं है।

संगठन ने यह भी कहा कि विद्यालयों का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवैधानिक मूल्यों, राष्ट्रीय एकता, भाईचारा और मानवता की भावना को विकसित करना होना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य किसी विशेष धार्मिक विचारधारा का प्रचार करना नहीं है, बल्कि बच्चों को एक जिम्मेदार और जागरूक नागरिक बनाना है।

आदिवासी छात्र युवा संगठन ने यह भी स्पष्ट किया कि आदिवासी समाज की अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराएं हैं। संविधान सभी समुदायों को अपनी संस्कृति और पहचान को सुरक्षित रखने का अधिकार देता है। ऐसे में यदि किसी एक धार्मिक परंपरा को प्राथमिकता दी जाती है तो इससे अन्य समुदायों के विद्यार्थियों में असमानता और उपेक्षा की भावना उत्पन्न हो सकती है।

संगठन ने राज्य सरकार से मांग की है कि इस आदेश की तत्काल समीक्षा की जाए और विद्यालयों में ऐसी प्रार्थनाओं एवं गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए जो संविधान की प्रस्तावना, राष्ट्रीय एकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवता, पर्यावरण संरक्षण और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित हों।

अंत में संगठन ने यह स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि शासकीय शिक्षा संस्थानों की धर्मनिरपेक्षता और संविधान की मूल भावना की रक्षा के लिए है। उनका उद्देश्य एक समावेशी और समान शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है, जहां सभी विद्यार्थी बिना किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा प्राप्त कर सकें।