मनेन्द्रगढ़ पुलिस की ‘फुटेज’ फाइल कोर्ट में पेश, आरटीआई से खुला खाकी का राज

मनेन्द्रगढ़ सिटी कोतवाली से जुड़ा बहुचर्चित सीसीटीवी फुटेज मामला अब न्यायालय की दहलीज पर पहुंच गया है। आरटीआई के तहत जानकारी देने से बच रही पुलिस पर सवाल खड़े हो गए हैं। आवेदिका लक्ष्मी नामदेव की कानूनी लड़ाई के बाद अब 11 अक्टूबर 2025 की 50 मिनट की फुटेज कोर्ट के सामने पेश की जाएगी।

Feb 19, 2026 - 16:54
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मनेन्द्रगढ़ पुलिस की ‘फुटेज’ फाइल कोर्ट में पेश, आरटीआई से खुला खाकी का राज

UNITED NEWS OF ASIA .प्रदीप पटाकर , कोरिया | मनेन्द्रगढ़मनेन्द्रगढ़ पुलिस से जुड़ा बहुचर्चित ‘CCTV फुटेज कांड’ अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। थाने की चारदीवारी के भीतर दबाई जा रही जानकारी अब अदालत के सामने रखी जाएगी। मामला सीधे तौर पर मनेन्द्रगढ़ सिटी कोतवाली से जुड़ा है, जहां एक खास तारीख की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

पूरा विवाद 11 अक्टूबर 2025 की उस करीब 50 मिनट की सीसीटीवी फुटेज को लेकर है, जिसे सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगा गया था। आरोप है कि यह फुटेज एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम से जुड़ी है, लेकिन पुलिस की ओर से इसे देने में लगातार टालमटोल की गई।

इस पूरे मामले में सबसे अहम भूमिका रही है आरटीआई आवेदिका लक्ष्मी नामदेव की। उन्होंने जानकारी हासिल करने के लिए लंबी प्रशासनिक और कानूनी लड़ाई लड़ी। पहले थाना स्तर पर आवेदन किया गया, लेकिन कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इसके बाद मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंचा और अंततः प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

बताया जा रहा है कि अपीलीय अधिकारी (DSP मुख्यालय) ने स्पष्ट शब्दों में पुलिस को समय-सीमा के भीतर जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। बावजूद इसके, जब निर्धारित समय में जानकारी नहीं दी गई, तो आवेदिका को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।

सूत्रों के अनुसार, आरटीआई आवेदन से जुड़े इस मामले में तत्कालीन थाना प्रभारी दीपेश सैनी की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप यह हैं कि उनके नेतृत्व में पुलिस टीम ने फुटेज को लेकर स्पष्ट जानकारी देने से परहेज किया और प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से लंबा खींचा गया।

मामले के तूल पकड़ने के बाद शिकायत और अपील की प्रतियां एमसीबी पुलिस अधीक्षक कार्यालय तक भी पहुंची थीं। वहां से भी आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए, लेकिन स्थानीय स्तर पर स्थिति में कोई ठोस बदलाव नहीं हुआ।

अब यह पूरा प्रकरण औपचारिक रूप से मनेन्द्रगढ़ न्यायालय के समक्ष विचाराधीन हो गया है। कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि यह साबित होता है कि महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को जानबूझकर छिपाया गया या उपलब्ध कराने में बाधा डाली गई, तो यह न केवल आरटीआई कानून का उल्लंघन होगा, बल्कि विभागीय और कानूनी कार्रवाई का आधार भी बन सकता है।

शहर में इस प्रकरण को लेकर चर्चा तेज है। आम नागरिकों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी कौन-सी वजह थी, जिसके चलते एक सामान्य सूचना को उपलब्ध कराने में पुलिस को इतनी आपत्ति रही। वहीं, दूसरी ओर इस मामले को प्रशासनिक पारदर्शिता की कसौटी के रूप में भी देखा जा रहा है।

अब सभी की निगाहें अदालत की आगामी कार्यवाही पर टिकी हैं। यह तय होना बाकी है कि चर्चित 50 मिनट की सीसीटीवी फुटेज क्या सच्चाई सामने लाएगी और क्या मनेन्द्रगढ़ पुलिस पर लगे आरोपों की परतें न्यायिक प्रक्रिया में खुल पाएंगी या नहीं।