जानकारी के अनुसार, हाल ही में आयोजित अमृतधारा महोत्सव के दौरान भाजपा विधायक प्रतिनिधि सरजू यादव ने मंच से प्रशासनिक अधिकारियों को लेकर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि अधिकारियों की “साख क्या है, आज यहां हैं कल कहीं और होंगे।” एक जिम्मेदार पद से इस तरह का बयान प्रशासनिक मर्यादा और अनुशासन पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
विवाद यहीं नहीं थमा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सरजू यादव ने अपनी पत्नी एवं नगर पालिका अध्यक्ष प्रतिमा यादव की शासकीय गाड़ी से लगे ‘अध्यक्ष’ बोर्ड को हटाकर फेंक दिया। यह घटना इस बात का प्रतीक मानी जा रही है कि कागजों में भले ही अध्यक्ष प्रतिमा यादव हों, लेकिन वास्तविक नियंत्रण कथित तौर पर उनके पति के हाथों में है।
यह पूरा मामला सीधे तौर पर ‘प्रॉक्सी कल्चर’ से जुड़ता है, जिसे समाप्त करने के लिए छत्तीसगढ़ नगरीय प्रशासन विभाग द्वारा पहले ही स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जा चुके हैं। विभाग के अनुसार, महिला निर्वाचित प्रतिनिधियों के कामकाज में पतियों या परिजनों का हस्तक्षेप संवैधानिक मूल्यों और समानता के अधिकार के विपरीत है।
सूत्रों का कहना है कि नगर पालिका के कई विकास कार्यों, फाइलों और प्रशासनिक निर्णयों में सरजू यादव की सक्रिय भूमिका लगातार देखी जा रही है। इससे यह आशंका और मजबूत होती है कि शासन के आदेशों का पालन केवल कागजों तक सीमित रह गया है।
इस पूरे प्रकरण में नगर पालिका के मुख्य नगर पालिका अधिकारी इशाक खान की चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है। आमजन यह जानना चाहता है कि क्या प्रशासन राजनीतिक दबाव के आगे असहाय हो चुका है, या फिर जानबूझकर इस पूरे मामले से आंखें मूंदे हुए है।
सरजू यादव द्वारा दिया गया एक और बयान भी चर्चा में है, जिसमें उन्होंने कहा कि “नगरपालिका के बिना प्रशासनिक अधिकारियों के घर में सफाई तक नहीं हो पाती।” इस कथन को लेकर नागरिकों में रोष है, क्योंकि इसे सरकारी संसाधनों और सेवाओं को निजी उपकार की तरह पेश करने वाला बयान माना जा रहा है।
महिला सशक्तिकरण की बातें करने वाली व्यवस्था में इस तरह का व्यवहार न केवल एक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को भी कमजोर करता है।
अब जनता के बीच यह सवाल तेजी से गूंज रहा है कि क्या मनेंद्रगढ़ नगर पालिका में नियम केवल आम नागरिकों के लिए हैं? क्या शासन इस कथित ‘पति-राज’ और प्रशासनिक हस्तक्षेप के मामलों में निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों पर कार्रवाई करेगा, या फिर यह पूरा मामला भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
प्रदेश की छवि, महिला प्रतिनिधित्व की गरिमा और प्रशासनिक विश्वसनीयता को बचाने के लिए अब शासन स्तर पर ठोस और पारदर्शी कार्रवाई की मांग जोर पकड़ रही है।