मामला कुसमुंडा परियोजना के हृदय स्थल नेहरू नगर स्थित पानी टंकी मैदान से जुड़ा है, जहां कई एकड़ सार्वजनिक भूमि पर एक ठेकेदार द्वारा अपने दर्जनों नए और कबाड़ हो चुके भारी वाहनों को खड़ा किया जा रहा है। यह मैदान पहले कर्मचारियों एवं स्थानीय लोगों के उपयोग के लिए माना जाता रहा है, लेकिन अब यह पूरी तरह ठेकेदार के कब्जे में चला गया है।
हैरानी की बात यह है कि एक ओर खदान विस्तार के लिए एक-एक इंच भूमि के लिए प्रबंधन को जद्दोजहद करनी पड़ रही है, वहीं दूसरी ओर कर्मचारियों की सुविधाओं के लिए उपयोगी इस मैदान को निजी ठेकेदार के हवाले कर दिया गया है। मैदान का एक बड़ा हिस्सा आज भी खाली पड़ा है, जिसे श्रमिक संगठन जनहित में चौपाटी अथवा सुव्यवस्थित बाजार के रूप में विकसित करने की मांग कर रहे हैं।
श्रमिक संगठन भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) द्वारा लगातार यह मांग उठाई जा रही है कि गायत्री मंदिर चौक और आसपास सड़क किनारे लगने वाले सब्जी, फल, जूस एवं खाने-पीने के ठेलों को इसी मैदान में स्थानांतरित किया जाए। वर्तमान में सड़क किनारे दुकानों के कारण आए दिन जाम की स्थिति बनती है, जिससे कर्मचारियों को खदान और कार्यालय आने-जाने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
यदि यह दुकानें नेहरू नगर पानी टंकी मैदान में स्थानांतरित की जाती हैं, तो न केवल यातायात व्यवस्था में सुधार होगा, बल्कि आसपास की कॉलोनियों के रहवासियों को भी एक सुविधाजनक बाजार और पार्किंग की व्यवस्था मिल सकेगी। इस मैदान को चौपाटी के रूप में विकसित कर कर्मचारियों और स्थानीय नागरिकों के लिए उपयोगी बनाया जा सकता है।
लेकिन आरोप है कि कुसमुंडा प्रबंधन अपने कर्मचारियों के हितों की अनदेखी कर एक करोड़पति ठेकेदार को लाभ पहुंचाने में जुटा हुआ है। बताया जा रहा है कि ठेकेदार के कब्जे वाले इस मैदान के भीतर 10-10 लाख रुपये की लागत से बने कई वातानुकूलित भवन भी मौजूद हैं, जिनका निर्माण एसईसीएल के फंड से कराया गया था। इसके अलावा इसी ठेकेदार द्वारा कई अधिकारी स्तर के आवासों पर भी कब्जा किए जाने की शिकायत सामने आई है।
इन सभी मामलों को लेकर प्रबंधन को लिखित शिकायतें भी दी गई हैं, लेकिन अब तक किसी भी प्रकार की ठोस जांच या कार्रवाई नहीं की गई है। कर्मचारियों और श्रमिक संगठनों का आरोप है कि प्रबंधन सीधे तौर पर ठेकेदार को संरक्षण देकर उसे लाभ पहुंचा रहा है।
स्थानीय कर्मचारियों का कहना है कि यदि जल्द ही इस मामले में निष्पक्ष जांच कर सार्वजनिक मैदान को मुक्त नहीं कराया गया, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे। पूरे प्रकरण ने कोरबा जिले में एसईसीएल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।