भ्रष्टाचार की ‘सूखी’ डबरी: बिना जल स्रोत बने पर्कोलेशन टैंक पर लाखों खर्च, जांच की मांग

मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) जिले के ग्राम पंचायत कठौतिया में निर्मित पर्कोलेशन टैंक (डबरी) पर लगभग सात लाख रुपये खर्च किए जाने के बावजूद उसके अनुपयोगी होने के आरोप लगे हैं। ग्रामीणों का दावा है कि बिना वैज्ञानिक सर्वे और पर्याप्त जल स्रोत के निर्माण कराया गया। मामले में तकनीकी और वित्तीय जांच की मांग तेज हो गई है।

Feb 22, 2026 - 15:50
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भ्रष्टाचार की ‘सूखी’ डबरी: बिना जल स्रोत बने पर्कोलेशन टैंक पर लाखों खर्च, जांच की मांग

UNITED NEWS OF ASIA. प्रदीप पाटकर, कठौतिया (मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर, एमसीबी)। विकास कार्यों की आड़ में सरकारी राशि के दुरुपयोग का मामला ग्राम पंचायत कठौतिया से सामने आया है। यहां निर्मित एक ‘डबरी’ (पर्कोलेशन टैंक) को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि बिना पर्याप्त जल स्रोत और वैज्ञानिक सर्वे के लाखों रुपये खर्च कर निर्माण कराया गया, जो वर्तमान में अनुपयोगी पड़ा है।

निर्माण पर उठे तकनीकी सवाल

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस स्थल पर डबरी बनाई गई है, वह पथरीली और अपेक्षाकृत सूखी भूमि है। आसपास कोई स्पष्ट प्राकृतिक जल स्रोत या ढलान दिखाई नहीं देता, जिससे वर्षा जल संचयन की पर्याप्त संभावना बन सके। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि निर्माण से न तो सिंचाई में लाभ मिलेगा और न ही मत्स्य पालन जैसी आयवर्धक गतिविधियां संभव होंगी।

अधूरे कार्य का आरोप

निर्माण स्थल पर लगाए गए सूचना बोर्ड में कार्य पूर्ण होने की तिथि 05.02.2026 अंकित बताई जा रही है, जबकि मौके पर संरचना अधूरी और अनुपयोगी नजर आने का दावा किया गया है। ग्रामीणों ने इसे “कागजी पूर्णता” करार दिया है।

व्यय का विवरण और पारदर्शिता का प्रश्न

प्राप्त जानकारी के अनुसार, निर्माण कार्य में ₹5,32,257 सामग्री मद तथा ₹1,56,831 मजदूरी मद में व्यय दर्शाया गया है। कुल मिलाकर लगभग सात लाख रुपये से अधिक की राशि खर्च होने का उल्लेख है। ग्रामीणों ने मांग की है कि व्यय की तकनीकी और वित्तीय जांच कराई जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि राशि का उपयोग नियमानुसार हुआ या नहीं।

प्रशासन से कार्रवाई की मांग

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिला प्रशासन से डबरी निर्माण की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराने, संबंधित इंजीनियर व तकनीकी सहायकों की भूमिका की समीक्षा करने तथा दोष सिद्ध होने पर आवश्यक कार्रवाई करने की मांग की है। उनका कहना है कि जल संरक्षण जैसी महत्वपूर्ण योजना में लापरवाही से न केवल सरकारी धन की हानि होती है, बल्कि किसानों की उम्मीदों को भी आघात पहुंचता है।

जल संरक्षण और ग्रामीण विकास योजनाएं किसानों की आय और जलस्तर सुधारने के उद्देश्य से संचालित की जाती हैं। यदि निर्माण स्थल का चयन बिना वैज्ञानिक मूल्यांकन के किया गया है, तो यह गंभीर प्रशासनिक चूक मानी जाएगी। अब निगाहें जिला प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं कि वह इस मामले में क्या कदम उठाता है।