यह ग्राम पंचायत मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिला अंतर्गत आती है। आरोप है कि डबरी का निर्माण बिना पर्याप्त जल स्रोत, बिना वैज्ञानिक सर्वे और बिना स्थल की वास्तविक उपयोगिता का आकलन किए किया गया है, जिस पर लाखों रुपये खर्च कर दिए गए।
निर्माण स्थल को लेकर उठे तकनीकी सवाल
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जिस स्थान पर डबरी बनाई गई है, वह क्षेत्र पथरीला और अपेक्षाकृत सूखा है। आसपास न तो कोई स्पष्ट प्राकृतिक जल स्रोत मौजूद है और न ही ऐसी ढलान दिखाई देती है, जिससे वर्षा जल का पर्याप्त संग्रह संभव हो सके। ग्रामीणों के अनुसार, इस स्थिति में डबरी से न तो खेतों की सिंचाई में कोई ठोस लाभ मिलने की संभावना है और न ही मत्स्य पालन जैसी आयवर्धक गतिविधियां शुरू हो सकेंगी।
ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण स्थल के चयन से पहले किसी भी प्रकार का वैज्ञानिक या तकनीकी सर्वे नहीं कराया गया, जो जल संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण कार्य में अनिवार्य माना जाता है।
अधूरे कार्य को बताया गया पूर्ण
निर्माण स्थल पर लगाए गए सूचना बोर्ड में कार्य पूर्ण होने की तिथि 05 फरवरी 2026 अंकित बताई जा रही है। जबकि मौके पर मौजूद ग्रामीणों का दावा है कि डबरी की संरचना अभी भी अधूरी और अनुपयोगी स्थिति में पड़ी हुई है। कई हिस्सों में मिट्टी कटाव, समुचित गहराई का अभाव और पानी ठहराव की कोई व्यवस्था नजर नहीं आती।
ग्रामीणों ने इस स्थिति को “कागजी पूर्णता” बताते हुए कहा है कि सिर्फ रिकॉर्ड में कार्य को पूर्ण दिखाकर भुगतान किया गया प्रतीत होता है।
खर्च का विवरण और पारदर्शिता पर सवाल
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस निर्माण कार्य में सामग्री मद में ₹5,32,257 तथा मजदूरी मद में ₹1,56,831 खर्च दर्शाया गया है। इस प्रकार कुल लगभग सात लाख रुपये से अधिक की राशि व्यय होने का उल्लेख है।
ग्रामीणों का कहना है कि इतने बड़े खर्च के बावजूद यदि डबरी का उपयोग ही संभव नहीं है, तो यह सीधे तौर पर सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का मामला बनता है। उन्होंने मांग की है कि पूरे प्रकरण की तकनीकी जांच के साथ-साथ वित्तीय ऑडिट भी कराया जाए।
प्रशासन से जांच और कार्रवाई की मांग
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिला प्रशासन से मांग की है कि डबरी निर्माण की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए। साथ ही संबंधित इंजीनियर, तकनीकी सहायक एवं कार्य से जुड़े अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा की जाए। दोष सिद्ध होने पर संबंधितों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की मांग भी की गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि जल संरक्षण योजनाएं किसानों और ग्रामीणों की आजीविका से सीधे जुड़ी होती हैं। यदि ऐसी योजनाओं में लापरवाही और मनमानी होती रही, तो न केवल सरकारी धन की बर्बादी होगी बल्कि किसानों की उम्मीदों को भी गहरा आघात पहुंचेगा।
निष्कर्ष
जल संरक्षण और ग्रामीण विकास से जुड़ी योजनाएं प्रदेश के जलस्तर सुधारने और किसानों को स्थायी लाभ देने के उद्देश्य से चलाई जाती हैं। यदि डबरी निर्माण के लिए स्थल का चयन बिना वैज्ञानिक मूल्यांकन के किया गया है, तो यह गंभीर प्रशासनिक चूक मानी जाएगी। अब पूरे मामले में प्रशासनिक जांच और कार्रवाई पर लोगों की निगाहें टिकी हुई हैं।