इतिहासकारों के अनुसार 1 मई 1919 को मोहला क्षेत्र के पानाबरस गांव में जन्मे लाल श्याम शाह आदिवासी समाज के ऐसे जननेता थे, जिन्होंने अपने जीवन को समाज सेवा और जनअधिकारों की लड़ाई के लिए समर्पित कर दिया। संपन्न परिवार से होने के बावजूद उन्होंने जल-जंगल-जमीन के अधिकार, सांस्कृतिक पहचान और आदिवासी समाज के सम्मान के लिए लगातार संघर्ष किया। समाज को संगठित करने के उद्देश्य से उन्होंने आदिवासी महासभा के माध्यम से जागरूकता और एकजुटता का अभियान भी चलाया।
स्वतंत्रता के बाद उन्होंने लोकतांत्रिक राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई। पहले चुनाव में मामूली अंतर से हारने के बाद अदालत के आदेश पर दोबारा चुनाव हुआ, जिसमें वे विजयी हुए। हालांकि आदिवासी समाज के शोषण और सरकारी नीतियों से निराश होकर उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। अपने इस्तीफे में उन्होंने आदिवासी हितों की अनदेखी और ठेकेदारी व्यवस्था को इसके लिए जिम्मेदार बताया था।
अक्टूबर 1960 में रायपुर में उनकी मुलाकात भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru से भी हुई थी। उस समय उन्होंने हजारों आदिवासियों के साथ पदयात्रा कर उनकी समस्याओं और मांगों को सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंचाने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों के विकास, आर्थिक सुरक्षा और अधिकारों के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना था।
वर्ष 1962 में लाल श्याम शाह Chanda Lok Sabha Constituency (वर्तमान चंद्रपुर) से लोकसभा सांसद चुने गए। सांसद बनने के बाद उन्होंने संसद में आदिवासी बहुल क्षेत्रों के लिए अलग गोंडवाना राज्य की मांग उठाई। जब उनकी मांगों पर कोई ठोस पहल नहीं हुई तो उन्होंने पद का मोह त्यागते हुए इस्तीफा दे दिया और गांव लौट आए। अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा था कि जब देश में सांस्कृतिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक आधार पर नए राज्य बनाए जा रहे हैं, तो गोंडवाना क्षेत्र की मांग की अनदेखी करना अन्याय है।
साल 1975 में लागू Indian Emergency के दौरान भी उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सका। उन्हें गिरफ्तार कर लगभग एक वर्ष तक जेल में रखा गया, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। बाद के वर्षों में वे “जंगल बचाओ, मानव बचाओ” आंदोलन से भी जुड़े और आदिवासी क्षेत्रों में बड़े बांधों और परियोजनाओं से होने वाले विस्थापन के खिलाफ संघर्ष करते रहे।
10 मार्च 1988 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार और संघर्ष आज भी आदिवासी समाज को प्रेरित करते हैं। उन्होंने अपने पूरे जीवन में सत्ता और पद से अधिक समाज के अधिकार, सम्मान और आत्मसम्मान को प्राथमिकता दी।
उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में उनके जीवन, संघर्ष और विचारों को याद करते हुए नई पीढ़ी तक उनकी विरासत पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा। आयोजकों ने क्षेत्र के सभी सामाजिक संगठनों और नागरिकों से कार्यक्रम में शामिल होकर जननायक राजे लाल श्याम शाह को श्रद्धांजलि अर्पित करने की अपील की है।