जम्मू के जोरावर गांव के रहने वाले हमाम हुसैन का जीवन हमेशा चुनौतियों से भरा रहा। पांच साल पहले उनके पिता के निधन के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनके और उनके बड़े भाई के कंधों पर आ गई। परिवार की आजीविका चलाने के लिए दोनों भाइयों ने दूध बेचने का काम शुरू किया। हमाम रोजाना घर-घर जाकर दूध पहुंचाते थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने कुश्ती के सपने को कभी नहीं छोड़ा।
हमाम के बड़े भाई भी एक पहलवान थे और राज्य स्तर तक खेल चुके थे, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उन्हें कुश्ती छोड़नी पड़ी। हालांकि उन्होंने अपने छोटे भाई को हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। हमाम बताते हैं कि उनके भाई ही उन्हें दंगलों में लेकर जाते थे और लगातार अभ्यास के लिए प्रोत्साहित करते थे
सीमित संसाधनों और सुविधाओं के बावजूद हमाम ने अपनी मेहनत जारी रखी। वे रोजाना लगभग 20 किलोमीटर दूर मिट्टी के अखाड़े में अभ्यास करने जाते हैं। इसके अलावा मैट ट्रेनिंग के लिए उन्हें करीब 40 किलोमीटर दूर जम्मू तक का सफर तय करना पड़ता है। इतनी कठिन दिनचर्या के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
हमाम के पास कोई व्यक्तिगत कोच नहीं है। गांव के अखाड़े में सीनियर पहलवान ही उन्हें मार्गदर्शन देते हैं। जब वे साई सेंटर में अभ्यास करने जाते हैं, तब वहां कोच की मदद मिलती है। गांवों में खेल सुविधाओं की कमी के बावजूद उन्होंने अपने जुनून को जिंदा रखा और लगातार मेहनत करते रहे।
उनकी यह मेहनत आखिरकार रंग लाई जब उन्होंने खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में पुरुषों के 79 किलोग्राम फ्रीस्टाइल वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए हिमाचल प्रदेश के पहलवान मोहित कुमार को हराकर स्वर्ण पदक जीत लिया। यह उनके 14 साल के कुश्ती करियर का पहला राष्ट्रीय स्तर का गोल्ड मेडल है, जो उनके संघर्ष और समर्पण का प्रतीक है।
हमाम कहते हैं कि यह जीत उनके लिए सिर्फ एक पदक नहीं, बल्कि उनके संघर्षों की पहचान है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर सुविधाएं और समर्थन मिले, तो वहां के खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक सफलता हासिल कर सकते हैं।
आज हमाम हुसैन उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए हैं, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने सपनों को साकार करने का साहस रखते हैं। उनकी यह कहानी हमें सिखाती है कि मेहनत, लगन और परिवार का समर्थन हो, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता।