चिरमिरी में श्रीराम कथा महोत्सव में उमड़ा आस्था का सागर, जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने सुनाया सुंदरकांड और राम-भरत मिलाप
एमसीबी जिले के चिरमिरी में आयोजित विशाल श्रीराम कथा महोत्सव में जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने सुंदरकांड, राम-भरत मिलाप और भक्ति के प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा पंडाल जय श्रीराम और जय बजरंगबली के उद्घोष से गूंज उठा। हजारों श्रद्धालु कथा श्रवण कर भक्ति रस में डूबे नजर आए।
UNITED NEWS OF ASIA. जमील अंसारी l एमसीबी जिले के चिरमिरी स्थित गोदरी पारा के लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम में आयोजित विशाल श्रीराम कथा महोत्सव में श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। विश्वविख्यात संत एवं तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामभद्राचार्य के श्रीमुख से प्रवाहित श्रीराम कथा का श्रवण करने हजारों श्रद्धालु कथा स्थल पर पहुंचे। कथा के दौरान सुंदरकांड, राम-भरत मिलाप, चरण पादुका और भक्ति के विभिन्न प्रसंगों का अत्यंत भावपूर्ण और ज्ञानवर्धक वर्णन किया गया। पूरा कथा पंडाल “जय श्रीराम” और “जय बजरंगबली” के जयघोष से गूंज उठा।
कथा के दौरान जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने भगवान के स्वरूप और भक्ति के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भगवान स्वयं सभी श्रेष्ठ गुणों के मूल स्रोत हैं और केवल सच्ची भक्ति के माध्यम से ही उनकी अनुभूति संभव है। उन्होंने गीता और रामचरितमानस के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि भगवान माया और इंद्रियों से परे हैं तथा भक्त के प्रेम और समर्पण से प्रसन्न होते हैं।
जगद्गुरु ने कहा कि छत्तीसगढ़ भगवान श्रीराम का ननिहाल है, क्योंकि माता कौशल्या का जन्म इसी पावन भूमि पर हुआ था। उन्होंने रामनाम की महिमा बताते हुए कहा कि “सीताराम” मंत्र स्वयं में महामंत्र है और इसका स्मरण जीवन के कष्टों को दूर करने वाला है। उन्होंने श्रद्धालुओं से नियमित रूप से रामनाम जप करने का आह्वान किया और कहा कि कलियुग में प्रभु श्रीराम का नाम ही सबसे सरल और प्रभावी साधन है।
सुंदरकांड की महिमा का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल धार्मिक ग्रंथ का एक अध्याय नहीं बल्कि साहस, आत्मविश्वास, सेवा और समर्पण का संदेश है। उन्होंने बताया कि हनुमान जी का जीवन शक्ति, विनम्रता और भक्ति का अनुपम उदाहरण है। हनुमान जी ने अपने पराक्रम का कभी अहंकार नहीं किया और हर कार्य को प्रभु श्रीराम की कृपा मानकर पूरा किया।
राम-भरत मिलाप प्रसंग का वर्णन करते हुए जगद्गुरु ने भाईचारे, त्याग और परिवारिक मूल्यों की महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज के समय में जहां संपत्ति और धन के लिए भाई-भाई में विवाद देखने को मिलते हैं, वहीं भगवान श्रीराम और भरत का संबंध त्याग और प्रेम का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने बताया कि भरत ने अयोध्या का सिंहासन स्वीकार करने के बजाय भगवान राम की चरण पादुकाओं को राजसिंहासन पर स्थापित कर सेवक भाव से राज्य संचालन किया।
कथा के दौरान भारतीय संस्कृति, राष्ट्रधर्म और भाषा के संरक्षण पर भी विशेष जोर दिया गया। जगद्गुरु ने कहा कि हिंदी और संस्कृत हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं और युवाओं को अपनी भाषा एवं परंपराओं के प्रति सम्मान रखना चाहिए। उन्होंने भारतीय संस्कृति को विश्व की सबसे प्राचीन और प्रेरणादायक संस्कृति बताते हुए समाज में भाईचारा और नैतिक मूल्यों को मजबूत करने का संदेश दिया।
विशाल श्रीराम कथा महोत्सव में प्रतिदिन प्रदेशभर से श्रद्धालु और विशिष्ट अतिथि पहुंच रहे हैं। कथा में प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि, भाजपा संगठन के पदाधिकारी और स्थानीय संत-महात्मा भी शामिल होकर आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं। आयोजन समिति द्वारा श्रद्धालुओं के लिए पेयजल, प्रसाद और बैठने की समुचित व्यवस्था की गई थी।
कथा के प्रत्येक प्रसंग पर श्रद्धालु भावविभोर नजर आए और पूरा वातावरण भक्ति रस में डूबा दिखाई दिया। चिरमिरी में आयोजित यह कथा महोत्सव धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक समरसता का भी बड़ा केंद्र बन गया है।