राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (चिरायु) का असर: जन्मजात बधिरता से जूझ रहे तीन बच्चों का अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, रायपुर में सफल कॉक्लियर इंप्लांट

राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (चिरायु) के अंतर्गत समय पर स्क्रीनिंग, रेफरल और निःशुल्क उपचार की सुविधा से जन्मजात बधिरता से पीड़ित तीन बच्चों का AIIMS रायपुर में सफल कॉक्लियर इंप्लांट किया गया। तीनों बच्चे स्वस्थ हैं और चिकित्सकीय देखरेख में बेहतर श्रवण व भाषाई विकास की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

Feb 19, 2026 - 16:13
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राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (चिरायु) का असर: जन्मजात बधिरता से जूझ रहे तीन बच्चों का अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, रायपुर में सफल कॉक्लियर इंप्लांट

UNITED NEWS OF ASIA . अमृतेश्वर सिंह ,रायपुर | सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण और बाल स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर राज्य शासन की महत्वाकांक्षी पहल राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (चिरायु) ने एक बार फिर ठोस परिणाम देकर यह सिद्ध किया है कि समय पर पहचान और उपचार से बच्चों का भविष्य बदला जा सकता है। जन्मजात बधिरता से जूझ रहे तीन मासूम बच्चों का सफल कॉक्लियर इंप्लांट ऑपरेशन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, रायपुर में संपन्न हुआ है। वर्तमान में तीनों बच्चे स्वस्थ हैं और चिकित्सकीय निगरानी में हैं।

इस सफलता के पीछे चिरायु टीम द्वारा आंगनबाड़ी एवं समुदाय स्तर पर की गई नियमित स्क्रीनिंग, समय पर रेफरल और समन्वित उपचार व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह पूरा मॉडल आंगनबाड़ी से लेकर सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल तक एक सुदृढ़ स्वास्थ्य श्रृंखला को दर्शाता है।

कबीरधाम जिले के स/लोहारा विकासखंड अंतर्गत ग्राम चिलमखोदरा निवासी धैर्य मरकाम (पिता – श्यामू मरकाम) जन्म से ही श्रवण बाधा से पीड़ित थे। चिरायु टीम ‘ए’ स/लोहारा द्वारा नियमित जांच के दौरान उनकी समस्या की पहचान की गई। आवश्यक चिकित्सकीय परीक्षण और विशेषज्ञ परामर्श के बाद 16 फरवरी 2026 को उनका कॉक्लियर इंप्लांट सफलतापूर्वक किया गया। वर्तमान में धैर्य चिकित्सकीय देखरेख में हैं और आगे की पुनर्वास प्रक्रिया प्रारंभ की जा रही है।

इसी प्रकार कोरबा जिले के बालको क्षेत्र निवासी ढाई वर्षीय नक्ष कोशले में भी प्रारंभिक जांच के दौरान श्रवण समस्या का पता चला। समय रहते उन्हें उच्च संस्थान में रेफर किया गया और 14 फरवरी 2026 को सफल सर्जरी संपन्न हुई। चिकित्सकों के अनुसार बालक की स्थिति संतोषजनक है तथा नियमित फॉलो-अप किया जा रहा है।

तीसरा मामला सक्ति जिले के जैजैपुर विकासखंड के ग्राम हसौद की तीक्षिका साहू से जुड़ा है। आंगनबाड़ी स्तर पर स्क्रीनिंग के दौरान उसमें जन्मजात बधिरता की पुष्टि हुई। चिरायु टीम जैजैपुर द्वारा त्वरित कार्रवाई करते हुए प्रकरण को सुपर स्पेशियलिटी संस्थान भेजा गया, जहां 17 फरवरी 2026 को सफल कॉक्लियर इंप्लांट किया गया। अब तीक्षिका स्वस्थ हैं और स्पीच थेरेपी के माध्यम से श्रवण तथा भाषाई विकास की दिशा में निरंतर प्रगति कर रही हैं।

इन तीनों मामलों से यह स्पष्ट होता है कि यदि जन्म के बाद प्रारंभिक वर्षों में बच्चों की नियमित जांच की जाए और समय पर उपचार उपलब्ध कराया जाए, तो जन्मजात श्रवण बाधा जैसी गंभीर समस्या का भी प्रभावी समाधान संभव है।

परिजनों ने शासन एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि महंगी और जटिल सर्जरी होने के बावजूद उन्हें निःशुल्क उपचार उपलब्ध कराया गया, जिससे उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सका। विशेषज्ञों के अनुसार कॉक्लियर इंप्लांट सामान्य परिवारों के लिए आर्थिक रूप से अत्यंत कठिन होता है, लेकिन शासन की स्वास्थ्य योजनाओं के माध्यम से यह उपचार अब जरूरतमंद बच्चों तक पहुंच रहा है।

आंगनबाड़ी स्तर पर पहचान, जिला स्तरीय जांच और सुपर स्पेशियलिटी संस्थान में समयबद्ध सर्जरी की यह पूरी प्रक्रिया राज्य की संवेदनशीलता और स्वास्थ्य विभाग की सक्रिय कार्यप्रणाली का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आई है।