बिहान योजना से आत्मनिर्भरता की मिसाल बनीं शकुन्तला शार्दुल, सब्जी की खेती से बदल दी जिंदगी
कोंडागांव की शकुन्तला शार्दुल, जो कभी दूसरों के खेतों में मजदूरी करती थीं, आज बिहान योजना के सहयोग से आत्मनिर्भर किसान बन चुकी हैं। स्व-सहायता समूह से जुड़कर उन्होंने सब्जी की खेती शुरू की और अब हर महीने लगभग 15 हजार रुपए की स्थायी आय अर्जित कर रही हैं। उनकी सफलता ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन गई है।
UNITED NEWS OF ASIA. रामकुमार भारद्वाज, कोंडागांव। कभी दूसरों के खेतों में मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करने वाली शकुन्तला शार्दुल आज अपने ही खेत में मेहनत के बल पर आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी हैं। उनका यह परिवर्तन छत्तीसगढ़ शासन की बिहान योजना के तहत मिले अवसर और मार्गदर्शन का परिणाम है।
शकुन्तला वर्ष 2015 में सिलेंदरी स्व-सहायता समूह से जुड़ीं। समूह के माध्यम से उन्होंने पहली बार लोन लेकर सेंटरिंग प्लेट का व्यवसाय शुरू किया, लेकिन अपेक्षित लाभ न मिलने पर उन्होंने नई दिशा में कदम बढ़ाया। असफलता से निराश न होकर शकुन्तला ने अपने पति के सहयोग से सब्जी की खेती शुरू की।
समूह से मिले ऋण से उन्होंने खेत में बोरवेल करवाई और सिंचाई की सुविधा सुनिश्चित की। शुरुआती दिनों में उन्होंने मटर, बरबटी और भिंडी की खेती की, जिससे अच्छा लाभ हुआ। इस सफलता ने उन्हें और आत्मविश्वास दिया। इसके बाद शकुन्तला ने बिहान योजना से पुनः लोन लेकर ड्रिप सिंचाई प्रणाली लगवाई और खेती को बड़े पैमाने पर विस्तार दिया। अब वह बैंगन, टमाटर, भिंडी और मटर जैसी फसलों की बुआई करती हैं।
आज शकुन्तला की मेहनत रंग लाई है — उनकी खेती से प्रति माह लगभग 15 हजार रुपए की आय हो रही है। पहले जहाँ परिवार को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ता था, वहीं अब वही परिवार आर्थिक रूप से सक्षम और आत्मनिर्भर हो चुका है। उनका बेटा पढ़ाई कर रहा है और पति खेती में सक्रिय सहयोग देते हैं।
शकुन्तला कहती हैं — “बिहान योजना ने हमें खुद पर विश्वास करना सिखाया है। अब हम न केवल अपने परिवार की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, बल्कि अन्य महिलाओं को भी प्रेरित कर रहे हैं।”
बिहान योजना ने शकुन्तला जैसी हजारों ग्रामीण महिलाओं के जीवन में परिवर्तन की नई किरण जगाई है। स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएँ आज छोटे व्यवसाय, खेती, पशुपालन और हस्तशिल्प के जरिए आर्थिक स्वावलंबन और सामाजिक सम्मान की नई ऊँचाइयाँ छू रही हैं। शकुन्तला शार्दुल का उदाहरण इस बात का साक्ष्य है कि अवसर और दृढ़ संकल्प मिल जाए तो परिवर्तन निश्चित है।