कच्चे तेल की कीमतें फिर 72 डॉलर पर, लेकिन अभी सस्ता नहीं होगा पेट्रोल-डीजल

अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें ईरान युद्ध से पहले के स्तर 72 डॉलर प्रति बैरल पर लौट आई हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तत्काल राहत नहीं मिलेगी। मौजूदा स्टॉक, परिवहन और रिफाइनिंग प्रक्रिया के कारण उपभोक्ताओं को राहत मिलने में अभी करीब ढाई महीने लग सकते हैं।

Jun 26, 2026 - 17:10
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कच्चे तेल की कीमतें फिर 72 डॉलर पर, लेकिन अभी सस्ता नहीं होगा पेट्रोल-डीजल

UNITED NEWS OF ASIA. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर ईरान युद्ध से पहले के स्तर पर लौट आई हैं। गुरुवार को ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत करीब 72 डॉलर प्रति बैरल दर्ज की गई, जिससे उम्मीद जगी है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी जल्द राहत मिल सकती है। हालांकि ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सीधा लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचने में अभी समय लगेगा।

ब्रेंट क्रूड की मौजूदा कीमत लगभग उसी स्तर पर पहुंच गई है, जहां यह ईरान से जुड़े तनाव और युद्ध की स्थिति बनने से पहले थी। फरवरी के अंत में भी इसकी कीमत करीब 72 डॉलर प्रति बैरल थी। युद्ध के दौरान आपूर्ति को लेकर बढ़ी आशंकाओं के कारण कच्चे तेल में तेजी आई थी, लेकिन अब हालात सामान्य होने के साथ कीमतों में गिरावट देखने को मिली है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच हाल में बने समझौते तथा स्विट्जरलैंड में हुई वार्ता के बाद ईरानी तेल निर्यात पर कुछ प्रतिबंधों में ढील दी गई है। इसके चलते होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल टैंकरों की संख्या बढ़ी है और वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता में सुधार हुआ है। इससे कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम हुआ है।

इसके बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत कम होने की संभावना नहीं है। ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि वर्तमान में देश में बिक रहा ईंधन उस कच्चे तेल से तैयार किया गया है, जिसे पहले अधिक कीमत पर खरीदा गया था। इसलिए अभी सस्ते हुए कच्चे तेल का लाभ खुदरा बाजार तक नहीं पहुंचा है।

कच्चे तेल की खरीद से लेकर उसे पेट्रोल पंप तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया में लगभग 75 से 80 दिन का समय लगता है। पहले तेल उत्पादक देशों से जहाजों में लोडिंग होती है, फिर समुद्री मार्ग से भारत पहुंचने, रिफाइनिंग और वितरण की प्रक्रिया पूरी होती है। इसी वजह से मौजूदा सस्ती कीमतों का असर बाजार में आने में करीब ढाई महीने का समय लग सकता है।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि तेल विपणन कंपनियां अभी भी पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर वित्तीय दबाव झेल रही हैं। इसके अलावा सरकार पहले ही ईंधन पर उत्पाद शुल्क में कटौती कर चुकी है। ऐसे में कंपनियां और सरकार पहले अपने वित्तीय नुकसान की भरपाई करने का प्रयास करेंगी, उसके बाद ही कीमतों में कमी पर फैसला लिया जा सकता है।

यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक इसी स्तर पर बनी रहती हैं, तो अगस्त के अंत या सितंबर की शुरुआत से राहत के संकेत मिल सकते हैं। आम उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वास्तविक कमी दशहरे के आसपास देखने को मिल सकती है। फिलहाल विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी तेजी आने की संभावना भी कम है, जिससे बाजार में स्थिरता बनी रह सकती है।