‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ केवल दर्शन नहीं, बल्कि परम यथार्थ: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती
बेमेतरा जिले के ग्राम सलधा में सवा लाख शिवलिंग वाले मंदिर निर्माण के साथ शंकराचार्य स्वामिश्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का चातुर्मास चल रहा है। प्रवचन के दौरान उन्होंने ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ का तात्विक अर्थ समझाते हुए ब्रह्म को परम सत्य बताया। उन्होंने गणेश और कार्तिकेय के स्वरूप, उनकी कथाओं और गणेश पूजा के आध्यात्मिक महत्व पर भी विस्तार से प्रकाश डाला।
UNITED NEWS OF ASIA. अरुण पुरेना, बेमेतरा l जिले के ग्राम सलधा में सवा लाख शिवलिंग वाले ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है। इसी धार्मिक वातावरण में उत्तराम्नाय ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का दिव्य चातुर्मास भी आयोजित हो रहा है। धार्मिक आयोजन के दौरान ग्राम भैंसा मुड़ा के ग्रामीणों द्वारा पादुका पूजन किया गया। दंडी स्वामी ज्योतिर्मयानंद सरस्वती ने सलधा में शिवलिंग स्थापित करने वाले भक्तों के नामों की घोषणा की, जबकि अप्रमेय स्वामी ने विरुदावली का वाचन किया।
प्रवचन के दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या” के तात्विक अर्थ को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है और प्रपंचमय संसार मिथ्या है। उनके अनुसार जो तीनों कालों—भूत, वर्तमान और भविष्य—में निर्विकार रहे और कभी बाधित न हो, वही सत्य है। इसके विपरीत जो ज्ञान अथवा विचार के प्रकाश में समाप्त या बाधित हो जाए, उसे मिथ्या कहा जाता है।
शंकराचार्य ने इस अवधारणा को रस्सी और सर्प के उदाहरण से समझाया। उन्होंने कहा कि अंधकार या कम रोशनी में पड़ी रस्सी को देखकर व्यक्ति उसे सर्प समझ सकता है और भयभीत हो जाता है। लेकिन प्रकाश होने पर सर्प का भ्रम समाप्त हो जाता है और वास्तविकता में रस्सी ही दिखाई देती है। इसी प्रकार अज्ञान के कारण संसार हमें स्वतंत्र और स्थायी सत्य के रूप में दिखाई देता है, लेकिन ज्ञान और विवेक के प्रकाश में इसकी स्वतंत्र सत्ता का बोध समाप्त हो जाता है।
उन्होंने कहा कि संसार में रहते हुए उसे मिथ्या कहना विरोधाभास नहीं है। व्यावहारिक स्तर पर संसार दिखाई देता है, लेकिन पारमार्थिक दृष्टि से ब्रह्म के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु की स्वतंत्र सत्ता नहीं है। ज्ञान के प्रकाश में अंततः ब्रह्म ही सत्य रूप में शेष रहता है।
सवालाख शिवलिंग और शिवमय वातावरण
शंकराचार्य ने कहा कि भगवान शिव सवा लाख रूपों और सवा लाख नामों के साथ यहां पधारने वाले हैं। इसी भावना के साथ पूरे क्षेत्र में शिवमय वातावरण बनाया जा रहा है और शिव कथा का आयोजन किया जा रहा है।
प्रवचन के दौरान गणेश और कार्तिकेय में कौन बड़े हैं, इस विषय पर भी चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि विभिन्न पुराणों में इस संबंध में अलग-अलग कथाएं मिलती हैं। शिव महापुराण और गणेश पुराण में कार्तिकेय को बड़ा बताया गया है, जबकि ब्रह्म वैवर्त पुराण और पद्म पुराण में गणेश को बड़ा बताया गया है। उन्होंने इसे देवताओं की अनादि लीला और अलग-अलग कल्पों की परंपरा से जोड़कर समझाया।
गणेश जी के स्वरूप और पूजा के महत्व को बताते हुए उन्होंने उनके चार हाथों में मौजूद प्रतीकों की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि गणेश जी के हाथों में पाश, अंकुश, मोदक और अभय मुद्रा होती है। मोदक को संयम, आंतरिक आनंद और एकनिष्ठता का प्रतीक बताया गया। अभय मुद्रा भक्तों को निर्भयता प्रदान करने का संदेश देती है।
उन्होंने गणेश जी से जुड़ी विभिन्न पौराणिक कथाओं का उल्लेख करते हुए दुर्वा अर्पित करने की परंपरा का महत्व भी बताया। धार्मिक मान्यता के अनुसार गणेश पूजा किसी भी शुभ कार्य या पूजा से पहले की जाती है।
इस अवसर पर दंडी स्वामी उमेश आश्रम, सुरेंद्र आश्रम, वासुदेवाश्रम, छोटे आश्रम, शिवाश्रम, रामाश्रम, ज्योतिर्मायनंद सरस्वती, अप्रयय शिवसदातकृतानंद गिरी, ब्रह्मचारी शारदानंद, शंकर स्वरूप, प्रभु प्रभुतानंद, शंभु प्रेमानंद, ईश्वरानन्द, वैष्णवानंद सहित अनेक संत-महात्मा उपस्थित रहे। कार्यक्रम में साध्वी पूर्णांबा, साध्वी शारदाम्बा, आचार्यगण, वेदपाठी विद्यार्थी, श्रद्धालु तथा बड़ी संख्या में ग्रामीण भी मौजूद रहे।