डीएनए रिपोर्ट सहित साक्ष्यों पर सुनवाई के बाद विशेष न्यायालय ने सभी आरोपियों को किया दोषमुक्त
भोपाल की विशेष न्यायालय ने थाना गौतम नगर में दर्ज एक गंभीर आपराधिक प्रकरण में उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के परीक्षण के बाद सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में सफल नहीं हो सका।
UNITED NEWS OF ASIA. घनश्याम शर्मा, भोपाल l थाना गौतम नगर में दर्ज एक गंभीर आपराधिक प्रकरण में भोपाल की विशेष न्यायालय ने सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है। यह मामला एससी एआरटी क्रमांक 26/2021 से संबंधित था, जिसमें भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए थे।
मामले की सुनवाई विशेष न्यायाधीश (पोक्सो) कुमुदिनी पटेल की अदालत में हुई। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अपने साक्ष्य और गवाह प्रस्तुत किए। अभियोजन की ओर से डीएनए रिपोर्ट भी न्यायालय के समक्ष पेश की गई। हालांकि न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि किसी एक साक्ष्य को अलग-थलग देखकर नहीं, बल्कि पूरे साक्ष्य रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और सभी परिस्थितियों के समग्र मूल्यांकन के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के परीक्षण के बाद यह पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को आपराधिक मामलों में आवश्यक कानूनी मानक, अर्थात् "संदेह से परे" सिद्ध करने में सफल नहीं हो सका। इसी आधार पर अदालत ने सभी आरोपियों को दोषमुक्त करने का आदेश पारित किया।
आरोपियों की ओर से अधिवक्ता आमिर उल्ला खान ने पैरवी करते हुए अभियोजन की साक्ष्य श्रृंखला में मौजूद कमियों तथा विभिन्न विधिक पहलुओं को न्यायालय के समक्ष रखा। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि उपलब्ध साक्ष्य आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद अपना फैसला सुनाया।
यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि आपराधिक मामलों में अदालत केवल किसी एक साक्ष्य के आधार पर नहीं, बल्कि समस्त साक्ष्यों, उनकी विश्वसनीयता, गवाहों के बयानों और कानूनी कसौटियों के समग्र परीक्षण के बाद ही निर्णय देती है। न्यायिक प्रक्रिया में अभियोजन पर यह दायित्व होता है कि वह आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करे।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में अदालत का निर्णय उपलब्ध साक्ष्यों की गुणवत्ता, उनकी स्वीकार्यता और पूरे मामले की परिस्थितियों के समेकित मूल्यांकन पर आधारित होता है। इसलिए किसी एक रिपोर्ट या दस्तावेज का होना अपने आप में दोषसिद्धि की गारंटी नहीं माना जाता।