कैंसर की दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ₹3,000 की दवा ₹27,000 में क्यों?

कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाओं की कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। सुनवाई के दौरान प्राइस टू रिटेलर और अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच बड़े अंतर पर सवाल उठाया गया। अदालत ने जरूरी दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर रखने और कॉरपोरेट अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी व्यवस्था पर भी प्रश्न किए। वहीं, केरल हाई कोर्ट ने सार्वजनिक हित में सस्ती जीवनरक्षक दवाओं के निर्माण और आपूर्ति को लेकर केंद्र सरकार की शक्तियों पर टिप्पणी की है।

Sep 29, 2026 - 15:15
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कैंसर की दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ₹3,000 की दवा ₹27,000 में क्यों?

UNITED NEWS OF ASIA. नई दिल्ली। कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की बढ़ती कीमतों और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने प्राइस टू रिटेलर यानी PTR और अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP के बीच बड़े अंतर पर चिंता जताई। अदालत के समक्ष एक कैंसर दवा का उदाहरण रखा गया, जिसकी MRP करीब 27 हजार रुपये बताई गई, जबकि उसका PTR लगभग 3 हजार रुपये बताया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि किसी दवा के PTR और MRP में इतना बड़ा अंतर क्यों है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि आवश्यक दवाओं के लिए एक समान मूल्य निर्धारण मानदंड क्यों नहीं अपनाया जा सकता। सुनवाई के दौरान ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर यानी DPCO के तहत आवश्यक और गैर-आवश्यक दवाओं के बीच अंतर का मुद्दा भी सामने आया।

पीठ ने कॉरपोरेट अस्पतालों में मरीजों के लिए दवाओं की खरीद की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। अदालत ने इस बात पर चर्चा की कि अस्पतालों में इलाज करा रहे मरीजों को कई बार इन-हाउस फार्मेसी से ही दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। सरकारी योजनाओं के तहत इलाज करा रहे मरीजों की दवाओं का खर्च कौन वहन करता है, इस पर भी अदालत ने सवाल उठाया।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि इस विषय पर ऐसा समाधान तलाशने की आवश्यकता है, जिसमें सभी संबंधित पक्षों के हितों के बीच संतुलन बनाया जा सके। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।

केरल हाई कोर्ट की भी अहम टिप्पणी

दूसरी ओर, महंगी कैंसर दवाओं की उपलब्धता से जुड़े एक मामले में केरल हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार की शक्तियों पर टिप्पणी की है। अदालत ने पेटेंट अधिनियम, 1970 का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक हित में केंद्र सरकार के पास जीवनरक्षक दवाओं के निर्माण और आपूर्ति की व्यवस्था करने की शक्ति है।

अदालत के अनुसार, आवश्यकता पड़ने पर सरकार किसी कंपनी को दवा के निर्माण के लिए निर्देश देने की व्यवस्था का उपयोग कर सकती है। यह मामला महंगी कैंसर दवाओं को लेकर जून 2022 में दायर की गई याचिका से संबंधित था। याचिकाकर्ता की सुनवाई पूरी होने से पहले मृत्यु हो गई थी।

केरल हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार को सस्ती दवाओं की आवश्यकता, मरीजों की संख्या और सब्सिडी से होने वाले संभावित लाभ जैसे पहलुओं का आकलन करना चाहिए। हालांकि, अदालत ने तत्काल कैंसर दवाओं का उत्पादन शुरू करने का निर्देश नहीं दिया।

दोनों न्यायिक मामलों में कैंसर उपचार की लागत, दवाओं की कीमतों में अंतर और जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता से जुड़े मुद्दे सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट में जहां दवा की PTR और MRP के अंतर तथा मूल्य नियंत्रण पर सवाल उठे हैं, वहीं केरल हाई कोर्ट में सार्वजनिक हित में सस्ती दवाओं की उपलब्धता के लिए सरकार की वैधानिक शक्तियों पर चर्चा हुई है।