UNITED NEWS OF ASIA. सौरभ नामदेव, कवर्धा l 11 सितंबर 2026। कबीरधाम जिला प्रदेश में गन्ने की खेती के लिए प्रमुख क्षेत्रों में शामिल है। इस वर्ष जिले में करीब 30 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की फसल लगाई गई है। जिले में दो शक्कर कारखानों के साथ लगभग 300 गुड़ उद्योग भी संचालित हो रहे हैं। वर्तमान समय गन्ने की फसल की बढ़वार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है और आगामी नवंबर माह से गन्ने की कटाई शुरू होने की संभावना है। इसी को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र, कवर्धा ने किसानों को फसल में दिखाई दे रहे कीट प्रकोप से बचाव और उचित प्रबंधन को लेकर आवश्यक सलाह जारी की है।
कृषि विज्ञान केंद्र, कवर्धा के प्रमुख एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. बी.पी. त्रिपाठी के अनुसार वर्तमान में जिले के कुछ क्षेत्रों में गन्ने की फसल में स्केल कीट, सफेद मक्खी और पायरिल्ला के प्रकोप के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। पिछले करीब 15 दिनों से खेतों में नमी बनी हुई है और धूप कम निकलने के कारण इन कीटों का प्रभाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। ऐसे मौसम में किसानों को फसल की नियमित निगरानी करने और पत्तियों, पत्ती-आवरण तथा तने पर कीटों की मौजूदगी के लक्षणों की जांच करने की सलाह दी गई है।
कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों से कहा है कि गन्ने की फसल में किसी भी प्रकार के कीट या बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर अपने क्षेत्र के कृषि अधिकारी से संपर्क करें। कीट नियंत्रण के लिए केवल अनुशंसित दवा और निर्धारित मात्रा का ही उपयोग करने की सलाह दी गई है। किसान गन्ने की फसल से संबंधित तकनीकी मार्गदर्शन के लिए कृषि विज्ञान केंद्र, कवर्धा से भी संपर्क कर सकते हैं।
स्केल कीट गन्ने की पत्तियों, पत्ती-आवरण और तने पर चिपककर रस चूसता है। अधिक प्रकोप की स्थिति में पौधे कमजोर पड़ सकते हैं और पत्तियों का रंग पीला होने लगता है, जिससे गन्ने की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। डॉ. त्रिपाठी के अनुसार अधिक नमी और गर्म मौसम में इस कीट का प्रकोप बढ़ सकता है। संक्रमित गन्ने के टुकड़े यानी सेट लगाने से भी यह कीट खेत में फैल सकता है। कमजोर और तनावग्रस्त पौधे भी इसके प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर डायमीथोएट 0.1 प्रतिशत घोल के छिड़काव की सलाह दी गई है।
सफेद मक्खी भी जिले के कुछ क्षेत्रों में गन्ने की फसल को प्रभावित कर रही है। यह कीट पत्तियों की निचली सतह से रस चूसता है, जिससे पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं। अगस्त-सितंबर के दौरान इसके प्रकोप के लक्षण अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकते हैं। प्रभावित पौधों की बढ़वार रुकने से उत्पादन प्रभावित होने के साथ शक्कर और गुड़ की रिकवरी में भी कमी आ सकती है। इसके प्रबंधन के लिए कीट प्रतिरोधी किस्मों के स्वस्थ बीज का बीजोपचार कर बुवाई करने और बरसात के दौरान खेत में अतिरिक्त पानी की निकासी की उचित व्यवस्था रखने की सलाह दी गई है। रासायनिक प्रबंधन के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 500-600 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव की सलाह दी गई है।
पायरिल्ला कीट का प्रकोप भी जिले के कुछ क्षेत्रों में देखा गया है। हल्के भूरे रंग का यह कीट गन्ने की पत्तियों से रस चूसकर फसल को नुकसान पहुंचाता है। इसके बच्चे और वयस्क दोनों पौधों को प्रभावित कर सकते हैं। इसका प्रकोप सामान्यतः अप्रैल से अक्टूबर तक देखा जाता है। इसके नियंत्रण के लिए क्विनालफास 25 प्रतिशत घोल की 1.00 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव की सलाह दी गई है। किसानों से अपील की गई है कि किसी भी कीटनाशक का प्रयोग कृषि विशेषज्ञ या संबंधित कृषि अधिकारी की अनुशंसा के अनुसार ही करें।