धान खरीदी के अंतिम दौर में अव्यवस्था, सत्यापन के बाद भी टोकन नहीं मिलने से किसान परेशान, लिमिट व तिथि बढ़ाने की मांग
सरायपाली तहसील क्षेत्र में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी अंतिम चरण में है, लेकिन पंजीयन व सत्यापन पूर्ण होने के बावजूद टोकन जारी नहीं होने से किसान परेशान हैं। किसानों ने शासन से खरीदी सीमा और समय-सीमा बढ़ाने की मांग तेज कर दी है।
UNITED NEWS OF ASIA. जगदीश पटेल, सरायपाली। सरायपाली तहसील क्षेत्र में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी का कार्य अब अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है, लेकिन व्यवस्थागत खामियों के कारण बड़ी संख्या में किसान अब भी अपनी उपज बेचने से वंचित हैं। धान खरीदी के लिए आवश्यक पंजीयन और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बावजूद टोकन जारी नहीं किए जाने से किसानों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार कई किसानों के खाते, भूमि अभिलेख एवं अन्य आवश्यक दस्तावेज पूरी तरह सत्यापित हो चुके हैं, इसके बावजूद ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से उन्हें धान विक्रय के लिए टोकन नहीं मिल पा रहे हैं। टोकन के अभाव में किसान उपार्जन केंद्रों तक पहुंचने में असमर्थ हैं, जबकि खरीदी की समय-सीमा तेजी से समाप्त होती जा रही है।
किसानों का कहना है कि शासन द्वारा निर्धारित प्रति किसान धान खरीदी की लिमिट पहले से ही कम है। ऐसे में समय-सीमा समाप्त होने की स्थिति में उनके घरों, खलिहानों और खेतों में बड़ी मात्रा में धान रखा हुआ है। इससे न केवल आर्थिक नुकसान की आशंका है, बल्कि मौसम और भंडारण से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ रही हैं।
कई किसानों ने बताया कि वे बार-बार उपार्जन केंद्रों, सहकारी समितियों और संबंधित कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिल पा रहा है। कुछ स्थानों पर तकनीकी समस्याएं, सर्वर डाउन और पोर्टल की गड़बड़ियां भी सामने आ रही हैं, जिसके कारण टोकन जारी नहीं हो पा रहे हैं। इससे किसानों में आक्रोश और निराशा का माहौल है।
इस गंभीर समस्या को लेकर किसानों ने शासन एवं जिला प्रशासन से मांग की है कि धान खरीदी की अंतिम तिथि में वृद्धि की जाए तथा प्रति किसान खरीदी लिमिट को बढ़ाया जाए, ताकि सभी पात्र किसान अपनी पूरी उपज समर्थन मूल्य पर बेच सकें। किसानों का कहना है कि यदि समय रहते समाधान नहीं किया गया, तो उन्हें मजबूरी में धान औने-पौने दामों पर बेचने के लिए विवश होना पड़ेगा।
अब देखना यह होगा कि शासन और प्रशासन किसानों की इस जायज मांग पर कब तक ठोस निर्णय लेता है।