परिषद शिक्षा वर्ग में जितेन्द्र पवार का उद्बोधन, हेडगेवार और गुरुजी के जीवन से संगठन साधना का संदेश
विश्व हिन्दू परिषद छत्तीसगढ़ प्रांत के परिषद शिक्षा वर्ग में मध्य क्षेत्र संगठन मंत्री जितेन्द्र पवार ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और माधव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरुजी) के जीवन प्रसंगों से संगठन, राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और समर्पण का संदेश दिया। उन्होंने संगठन कार्य को राष्ट्र निर्माण की साधना बताते हुए कार्यकर्ताओं से समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित भाव से कार्य करने का आह्वान किया।
UNITED NEWS OF ASIA. अमृतेश्वर सिंह, रायपुर l विश्व हिन्दू परिषद छत्तीसगढ़ प्रांत द्वारा आयोजित परिषद शिक्षा वर्ग का समापन भिलाई-दुर्ग स्थित अग्रसेन भवन में हुआ। 5 जून से 15 जून 2026 तक चले इस प्रशिक्षण वर्ग में प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए कार्यकर्ताओं ने संगठन, सेवा, सुरक्षा, संस्कार और सामाजिक दायित्वों से जुड़े विषयों पर प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस दौरान मध्य क्षेत्र संगठन मंत्री जितेन्द्र पवार का प्रेरणादायी उद्बोधन कार्यकर्ताओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा।
अपने संबोधन में जितेन्द्र पवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तथा द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर के जीवन और कार्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संगठन का कार्य केवल किसी संस्था का विस्तार करना नहीं है, बल्कि राष्ट्र जीवन के पुनर्निर्माण की एक निरंतर साधना है। डॉ. हेडगेवार और गुरुजी का जीवन त्याग, अनुशासन, समर्पण और राष्ट्रभक्ति का अनुपम उदाहरण है।
उन्होंने गुरुजी के बाल्यकाल का एक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि बचपन में उनकी माता ने उन्हें समझाया था कि धरती हमारी माता है और उसे भी पीड़ा होती है। इस सीख ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने जीवनभर मातृभूमि के प्रति समर्पण का भाव बनाए रखा। उन्होंने यह भी बताया कि डॉ. हेडगेवार और गुरुजी के बीच अत्यंत आत्मीय संबंध थे, जिसके कारण संगठन को मजबूत आधार मिला।
उद्बोधन के दौरान संगठन की शक्ति और स्थायित्व पर भी विशेष चर्चा हुई। उन्होंने गुरुजी के उस प्रसिद्ध कथन का उल्लेख किया जिसमें संगठन को अभेद्य किला बताया गया था। उनके अनुसार संगठन की वास्तविक ताकत उसके अनुशासित और समर्पित कार्यकर्ताओं में निहित होती है।
जितेन्द्र पवार ने गुरुजी के जीवन प्रवास का उल्लेख करते हुए बताया कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्ययन और अध्यापन के दौरान उनका संघ से परिचय हुआ। बाद में उन्होंने पूर्णकालिक रूप से संगठन कार्य को अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने विभिन्न राज्यों में व्यापक प्रवास कर संगठन विस्तार का कार्य किया और राष्ट्र जीवन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर समाज का मार्गदर्शन किया।
उन्होंने देश विभाजन, कश्मीर, गोवा मुक्ति आंदोलन और चीन की विस्तारवादी नीति जैसे विषयों पर गुरुजी की दूरदर्शिता का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार गुरुजी केवल संगठनकर्ता नहीं थे, बल्कि एक दूरदर्शी राष्ट्रचिंतक भी थे, जिन्होंने समय-समय पर देश के सामने आने वाली चुनौतियों को पहले ही पहचान लिया था।
अपने संबोधन में उन्होंने डॉ. हेडगेवार की तीन महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं—प्रचारक पद्धति, गुरुदक्षिणा व्यवस्था और शाखा पद्धति—का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन व्यवस्थाओं ने संगठन को आत्मनिर्भर, अनुशासित और दीर्घकालिक रूप से प्रभावी बनाया। शाखा पद्धति के माध्यम से चरित्रवान और राष्ट्रनिष्ठ व्यक्तित्वों का निर्माण होता है, जो समाज और राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने कहा कि संघ और उससे प्रेरित संगठनों ने हिन्दू समाज में आत्मविश्वास का संचार किया है। समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और राष्ट्रीय चेतना के प्रति जागरूक बनाने में इन संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संगठन कार्य को जीवन की साधना बताते हुए उन्होंने कार्यकर्ताओं से आग्रह किया कि वे व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्रहित को प्राथमिकता दें।
कार्यक्रम के अंत में उन्होंने कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि वे डॉ. हेडगेवार और गुरुजी के जीवन से प्रेरणा लेकर संगठन कार्य को राष्ट्रसेवा का माध्यम बनाएं। उनका जीवन आज भी लाखों कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है और राष्ट्र निर्माण के मार्ग पर चलने की ऊर्जा प्रदान करता है।